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Sunday, 29 October 2017

शहर चीख़ता है

शहर चीखता है
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भेड़चाली दौर से निपटकर दिन
जब शाम की गोद में चल पड़ता है आराम फरमाने
जब भेड़ें सुस्त होकर ले रही होतीं है अपनी पहली नींद की ऊंघाई
कहीं दूर,कोसों दूर किसी चरवाह के बाड़े में

जब उल्लू और चमगादड़ मनाने लगते हैं
उनके हिस्से का सवेरा होने का जश्न
वे चल पड़ते हैं भूख मिटाने की तलाश में

जब सियार ले रहे होतें हैं मज़े
खेत मे किसी अधसोये किसान के डर का
वे करते हैं अपनी सामूहिक सामर्थ्य का प्रदर्शन
हुक़्क़ी-हुवा, हुक़्क़ी हुवा की आवाज़ करते हुये

तब
जब मैं समूची दुनिया के साथ
नींद की आगोश में अधमरा होता हूं
रात के ठीक बारह बजने के बाद
जब शहर भर के लोग समझते हैं कि शहर शांत है

ठीक उसी समय
मुझे सुनाई पड़ती है एक चीख़
मैं अचानक निकल आता हूं
बाहर खाली पड़ी  सूनसान गली में

मैं देखता हूं,
जो ज़िस्म अभी नींद की मार से मर चुके हैं
उनकी आत्मायें
दहाड़-दहाड़ कर नोंच रहीं थी किसी को
उसकी चीखों से आनन्दित हो रहीं थी
वह कराह रहा था
कर रहा था मिन्नतें कि उस पर रहम किया जाये
कोई नहीं सुन रहा था उसकी गिड़गिड़ाहट
आत्मायें,
मतलब की भूख से बहरी हो चुकीं थी

उन आत्माओं की भीड़ में
एक आत्मा थी सबसे क्रूर,सबसे निर्दयी
वह मैं था,

और

जो चीख रहा था,वह था शहर
हम सबका शहर..
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           सुशान्त मिश्र

Sunday, 10 September 2017

बीसवें जन्मदिन पर

बीसवें जन्मदिन पर....
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एक उपहार के तौर पर
मेरे दसवें जन्मदिवस के उपलक्ष्य में
मेरी माँ ने मुझे दी थी एक पैंट और टी शर्ट

टीशर्ट कि जिसमें नहीं थी आस्तीनें
जिसका गला मेरे गले के साइज से थोड़ा बड़ा था
मैनें कहा भी था माँ से,
यह मुझे फिट नहीं बैठती,
वो मुस्करा उठी थी उस वक़्त एक सवाल खींचकर
अपनी मुस्कान के साथ
पैंट कि जिसमें लगी हुई थी चार जेबें
हर जेब में टांके हुये थे दो बटन
जिससे अंदर रखी कोई चीज़,न निकल सके बाहर
बिना बटन खोले,
जिन्हें खोलने का अधिकार सिर्फ मुझे था

इस बार
अपने बीसवें जन्मदिन के उपलक्ष्य पर
जब मैं पहन सकता हूँ गलाघोंटू टीशर्ट
जिसकी आस्तीनें कसती हों मेरी गठीली बाहें
पहन सकता हूँ वो पैंट,
जो इतनी फटी हो कि दिख सकूँ मैं अमीर
जिसमे जेब होना नहीं हो कोई जरूरी बात
तब,
मैनें फिरसे अपने दसवें जन्मदिन का लिबास दोहराया है अपने बीसवें जन्मदिन के उपलक्ष्य पर
माँ मुस्कराते हुये
दस बरस पहले खींचे गये सवाल को समझा रही है
अब,
जब मैं समझने लायक हूँ

"टीशर्ट में नही थीं आस्तीनें
क्योंकि, आस्तीनों में बस सकते हैं सांप
जो होते है बहुत ही मीठे ज़हर वाले
गला था तुम्हारे गले से कुछ बड़ा
ताकि कोई ले न सके तुम्हारे गले की वास्तविक माप
और तुम सुरक्षित रहो, होशियार रहो
पैंट में थी चार जेबें
जिनमें बंद किये गये है तुम्हारी ज़िन्दगी के चार पन
जिसकी एक जेब तुमने बचपन में कर दी है खाली
आज तुम्हारे बीसवें जन्मदिन पर
खुल चुकी है दूसरी जेब
जो अब तुम खर्च करोगे इसलिये
कि तुम्हारी आगे की जेबें खुलने पर
सुख और आनंद की टॉफियों से भरी हुई मिलें
बची हुई चौथी जेब में रखी हुई है समय की पुरानी तस्वीर
जिमसें मैं और तेरे बाबूजी दिखेंगे तुझे
बीते हुये कल के साथ
तेरे आज को तकते हुये,हंसते हुये,आशीर्वाद देते हुये"
                                           #सुशान्त_मिश्र


Thursday, 24 August 2017

तुम खूबसूरत नहीं हो!

"तुम बहुत खूबसूरत हो" नहीं कहूंगा मैं
हां ये कहूंगा,
कि तुम खूबसूरती से परे एक आदर्श लड़की होने का सुबूत हो
उसकी बनायी दुनिया के  कोर्स में,
तुम हो वो ज़रूरी पाठ,
जिसे पढ़े बगैर नहीं पूरा होता कोई सबक़

तुम्हारे माथे की लकीरें किसी आयत में खींची गयी विकर्ण हैं,
दोनों भौहों के बीच की जगह है एक बिंदु,
जहाँ पर लगी हुई महरून बिंदी चाँद की दुश्मन है

तुम्हारी आंखों की तर्ज़ पर,
बनायीं गयी हैं बिल्लियों की आंखें
तुम्हारें नाज़ुक कान
हैं खरगोश की जान उसके कान में होने का मतलब

तुम इतनी नाज़ुक हो,सही है!
पर नहीं होना चाहिए था तुम्हें इतना नाज़ुक
कि किसी फूल की पंखुरी छू जाने भर से पड़ जाये निशान
और पागल दुनिया पूछने लगे,
"कल तुम्हे किसने छुआ?"

वक़्त की बिसात पर रखे गये सारे खूबसूरती मापने के पैमाने
तुम्हें देखकर ख़त्म कर दिए गये हैं
कि अब उन पैमानों की जगह,
रखी हुई है तुम्हारी तस्वीर..

                             -सुशान्त मिश्र

Wednesday, 18 January 2017

"हम" और "मैं"

हम और मैं
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जब दुनिया रची जा रही थी
सब कुछ पूर्व से ही सुनिश्चित था शायद

नाली के कीड़े से लेकर
बड़े-बड़े जंगली हांथियों तक
ज़हरीले साँप बिच्छुओं से लेकर
प्रकृति के दोस्त केंचुए तक
सारे पशु-पक्षी और हम...

हम मतलब दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रजाति
हम मतलब ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना
हम मतलब सद्गुणों से भरे-पूरे जीव
हम जो,
पूरी दुनिया के जीवों की अच्छाई सीख गये
हम जो,
देवताओं को भी सम्मोहित कर लेते थे

हम जो,
न्यूटन के क्रिया-प्रतिक्रिया नियम की तरह
प्रकृति को प्यार देते थे
प्रकृति हमारी जरूरते पूरी किया करती थी
जैसे अब भी करती है...

हम कुछ इस तरह विकासशील होने लगे
हमने सीखीं
अच्छाइयों के साथ मतलबी बुराइयों की हर चाल
जिसने उखाड़ कर फेंक दी
हमारी बरसों से संजोयी हुई प्यार की पौध
हमने खेला वो खेल,
जहाँ "हम" नहीं "मैं" विजयी होता है

हम सब "हम" के दौर से भागते-दौड़ते
आकर खड़े हो गए अकेले "मैं" पर

                            #सुशान्त_मिश्र

Tuesday, 10 January 2017

अपवादित इंसान

उसका इंसान होना अपवाद सिद्ध होता है
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जब उसके सूनेपन को
कोई समझ बैठता है उसका सर्वश्रेष्ठ गुण
जब उसका मौन
कोई समझ बैठता है सर्वश्रेष्ठ संगीत
जब उसका मुस्कुराना
कोई समझ बैठता है सर्वश्रेष्ठ कोमल अभिव्यक्ति
तब शुरुआत होती है एक युद्ध की
युद्ध का उद्देश्य होता है उसे मोह से हरा देना

जब वह जा रहा था अपनी अबूझी मंज़िल की ओर
उसे लग गई अचानक एक ठेस
जिसने घायल कर दिया उसका पूरा वर्तमान
वो रोड़ा,
जो बन सकता था उसकी हार का कारण
वह उसे ठेस देने के तुरंत बाद बढ़ चला
अपनी नयी राह पर एक नयी मंज़िल की ओर
उसने रोड़े को दिखा दिया उसका भविष्य
अब,
दोनों बढ़ चले थे अलग-अलग रास्तों पर
अपने भविष्य की ओर

वह तब भी खुश था
जब अनंतकाल से संजोयी हुई उसकी खुशियां
कोई लूट ले गया था
वह तब भी खुश था
जब उसके स्वयं के बनाये हुये रिश्ते उसे धकेल रहे थे
संघर्ष की आग में

न ही वह मनाता है विजय का उत्सव
न ही किसी पराजय का शोक
उसे काल की गति से नहीं है भय
भय नहीं क्योंकि मोह नहीं
मोह नहीं तो इंसान कैसे?

मोह हार चुका था
अब वह अपनी पराजय का शोक नहीं
शत्रु की विजय का उत्सव मना रहा था

सच,
उसका इंसान होना अपवाद सिद्ध होता है
उसके स्वभाव से
                                    #सुशान्त_मिश्र

Wednesday, 7 December 2016

वो सही थे...

वो सही थे......
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आज की तरह कल भी नींव खोदी जाएँगी
और फिर
मिट्टी, ईंटों और मसालों से बनायीं जाएँगी कुछ दीवारें
दीवारों से बनाये जायेंगे मकान...बस मकान..

मकान के अंदर होंगी,
हड्डियों,खून और माँस के लोथड़ों से बनी कुछ चलती-फिरती लाशें
आँखे खुली होंगी उनकी
फिर भी नहीं देख पाएंगे एक-दूसरे को
वो व्यस्त होंगे
मकान के एक-एक कोने पर अपना आधिपत्य करने में
उस कोने में बनाएंगे वे कल्पना की एक नयी दुनिया

वे खाएंगे कल्पनाओं को
ओढ़ेंगे उससे बनी चादरें
वो करेंगे कुछ कर्म स्वयं के लिये
जिससे वो खुश रह सकें
वे होंगे स्वयं के देवता
मनुष्य जो दूसरों के लिए जी रहा है,
जियेगा तब भी,किन्तु स्वयं के लिये

वो अपने वर्तमान में लिख गये आज का भविष्य
हमने उन्हें सत्य सिद्ध किया...
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                           #सुशान्त_मिश्र

Monday, 8 August 2016

आइना और वो...

वो अंधकार से लड़  रहा है
वो हर बात को समझ रहा है..जान रहा है
उसके लिए कुछ... कुछ भी असंभव नही

पेड़ की टहनियों का उनसे अलग होना
एक तने का रोना
पके फल का टूटकर गिरना और फिर उसका हश्र
फिरसे बने बीजों से नए पौधे तैयार होना
ये सब देखकर,
टूटकर जुड़ना नहीं,
टूटकर नया बनना सीख रहा है वो,
पेड़ों से...उनके तनों से
उनके फलों से भी..

अकेले में कभी-कभी छटपटाता है
बौखलाकर खुद को आईने में देखता है
और जोर-जोर से रोता है
और फिर अचानक...
आईना तोड़ देता है...
जानते हो आईना क्यों टूटा?
क्योंकि उसका धैर्य,उसका साहस छूटा
हाँ इसीलिये...इसीलिये वो आईना टूटा....
                                  सुशान्त मिश्र

Saturday, 6 August 2016

अपराजित प्रेम

~~~~~~~~~अपराजित प्रेम~~~~~~~~~~

सुनो;
मैं आज तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ
बुरा मत मानना,
क्योंकि मैं ऐसा कुछ भी नहीं कहूँगा,
जो तुम्हारे लिये हितकर न हो
तुम और मैं
समाज के मूल से निकली दो शाखायें
जिन्होंने आपस में एक दूसरे को गूंथ दिया
बिना किसी का भय किये
तुम,मुझे सिखाती थी, मैं कुछ यूँ ही सीख लिया करता था
तुम्हारी कभी न मिटने वाली अठखेलियों की रेखाओं से,

कल भी सब अच्छा था,आज भी सब अच्छा है
लेकिन आने वाला कल...
हमारे होंठ ठहर जाते हैं
सारे ज्ञान के घरों के किवाड़ धड़ाक से बंद हो जाते हैं
मन छटपटा उठता है जब तुम पूछ बैठती हो,
"आगे का क्या सोंचा है तुमने?"
फिर मैं एक लंबी सांस खींचकर
इधर-उधर देखने के बाद,
बड़ी लापरवाही से मुसकरा पड़ता हूँ
और तुम मेरे मूक हो जाने पर
अपने सवाल का जवाब खुद बताने लगती हो,
और वो भी मेरे नहीं पूछे जाने पर भी
तुम्हारा जवाब,तुम्हारे सारे सपनों के चित्र आसमान में खींचकर
मेरे मन को झकझोरकर,फिर मुझसे सवाल करता,
"क्या तुम वैसे बन पाओगे जैसा ये चाहती है?"

आज मैं तुम्हारे सारे सवालों का जवाब देने आया हूँ
मैं निष्ठुर सही,धोकेबाज सही,
पर तुम्हे यह सुनना पड़ेगा
सिर्फ सुनना ही नहीं समझना भी जो मैं समझाना चाहता हूँ,
हमने कई बार ज़िन्दगी की उलझी हुई अनेक गुत्थियों को,
सुलझा लिया है एक दूसरे के सहयोग से,
आज फिर तुम मेरा सहयोग करोगी न

तो सुनो,
मैं आज तुम्हारे सारे अधिकार तुम्हे सौंपना चाहता हूँ
मुझे भी तुम मुक्त कर दो अपने वचनों से
मैं भी कोशिश करूँगा की तुम मुझे भूलकर,
जियो अपनी नई ज़िन्दगी अपने सपनों के साथ
बस एक सपने का गला घोंट देना
मैं नहीं बन सकता तुम्हारे सपनों का राजा
क्योंकि मैं असमर्थ हूँ समाज के उस पेड़ के आगे
जिसकी छाँव में हमारा प्रेम पला,जवान हुआ
मैं झूठ इसलिये नहीं कह सकता क्योंकि
मैं झूठ सह नहीं सकता
तुम मेरा पहला प्रेम नहीं
तुम मेरी अंतिम चाह नहीं
तुम मेरी अधूरी प्यास नहीं
तुम मेरी कोई आस नहीं
तुम तो मेरी प्रेरणा हो,
मेरे कर्त्तव्य पथ बढ़ने की प्रेरणा जिसके लिए तुम हमेशा
मुझे दिखाती रहतीं थी मेरी औक़ात
और मैंने नहीं पार की तुम्हें दूषित करने की हदें

मैं तुम्हारे दिए सपनों को पूरा करने जा रहा हूँ
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए
लेकिन सच मानों,मुझे तुम्हे छोड़कर जाना पड़ेगा
तुम्हारे सुंदर भविष्य के लिये
ताकि आने वाले सुनहरे कल में
कोई मेरा नाम लेकर घोल न सके तुम्हारी ज़िन्दगी में विष
और तुम हमेशा खुश रहो....

अरे! ये क्या?तुम दुःखी हो गयीं
निराश मत हो हम फिर मिलेंगे जरूर
ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर
तब तुम अपने पूर्ण सपने के साथ मुझे मिलना
अचानक मुझे देखकर आंसू मत बहाना
बस मेरी बातों को याद करना
फिर मुझसे अजनबी होकर कहना
"बहुत अच्छा लगा आपसे मिलकर"

तब मैं समूचे समाज को दिखा दूंगा
एक नये प्रेम की परिभाषा का चित्र
फिर हम हारकर भी जीत जायेंगे
तब अमर होकर आसमान में एक तारे की तरह चमक उठेगा
हमारा हारकर,जीता हुआ अपराजित प्रेम......
                                       ~:  सुशान्त मिश्र