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Sunday, 13 August 2017

"रुक-रुक,यहीं रोक ले आज" मैंने नसरू को कंधे पर थपकी देते हुये रुकने को कहा है।
"क्यों? आज यहां क्या है छोटे? तेरा कमरा तो क्रासिंग के पास है न!" बाइक को रोकते हुये नसरू ने जवाब तलब किया है।
"हां.. पर आज थोड़ी दूर पैदल चलने का मन है,तू निकल! कल मिलते हैं!"
"जैसी तेरी मर्ज़ी! पर कोई गड़बड़ न करना छोटे! पता चले मियाँ कल सुबह कोचिंग से पहले अख़बार की सुर्खियों में मिलें" दोस्त मज़े लेने से नहीं चूकते।
"भरोसा रखो! तेरा छोटे इतना कमज़र्फ नहीं"
  हल्की मुस्कान के साथ उसने बाइक मोड़ ली,"कल जल्दी उठना"कहते हुये छू मंतर हो गया।
   आठ नंबर चौराहे के इस पार से उस पार जाना है। सुबह के करीब दस बज रहें हैं। आंख खुलने के बाद दुनिया जिस घुड़दौड़ में शामिल हो जाती है वहीं मैं देख रहा हूँ यहां भी। अभी-अभी जैसे ही कदम बढ़ाया था कि मेरे दाहिनी ओर से आती हुई कार के ड्राइवर को ज़ोर की ब्रेक मारनी पड़ी थी,नतीजतन मैं ठिठक गया हूं, मुझे कोई जल्दी नहीं है,ट्रैफिक कम होगा तब निकलूंगा, क्योंकि मुझे ये भी पता है कि मेरे कमरे के पार्टनर ने आज मेरा दोपहर का दाल-चावल तैयार कर रखा होगा,मैनें कोचिंग से निकलते ही उसे फोन करके ऐसा करने को कहा था और उसे यह भी बताया कि हो सकता है मुझे पहुंचने में देर हो जाये क्योंकि मैं आज पैदल आने वाला हूं। 
  गर्मियों के दिनों में सुबह और शाम दोनों ही अपनी सीरत के लिए मशहूर हैं,आसमान साफ है,सफेद बादल इधर उधर टहलते दिख रहे हैं। बायें हाँथ की कलाई पर पिताजी की दी हुई पुरानी एच एम टी घड़ी को एक टक देखकर पता चला कि पिछले पंद्रह मिनट से मैं चौराहे के इसी ओर खड़ा हूँ,ट्रैफिक कम है,लेकिन है ज़रूर,लखनऊ की छोटी सड़कें यहां बड़ी सड़कों की अपेक्षा कुछ ज्यादा प्रयोग में लायी जाती हैं। इस बार मैंने अपने दोनों हांथों से ट्रैफिक से रहम मांगते हुये चौराहे को पार कर लिया है।ये लखनऊ है,यहां तहज़ीब के साथ नवाबी भी है,इसीलिये मुझे यही सही लगा।
    चौराहे से क्रासिंग की ओर जाने वाली सड़क के दाहिनीं ओर पुलिस बूथ है,जो अक्सर खाली देखा जा सकता है।उसी बूथ के ठीक सामने,मतलब की रोड के बायीं ओर बड़े गेट वाला मकान है,मकान के ठीक सामने उसकी चारदीवारी के आस-पास बकैने(नीम की तरह का एक पेड़,जिसकी पत्तियां भी नीम की ही तरह होती हैं) के तीन पेंड है। मकान के गेट से ठीक दायीं ओर लगे पेंड के नीचे एक चबूतरा बनवाया गया है,जिसपर श्री हनुमान जी की मूर्ति रखी गयी है।
  मेरा सिर अमूमन उस मूर्ति के समक्ष अभिवादन हेतु झुक  जाता है।एक पुजारी जी इस मूर्ति की देखभाल करते हैं, अबतक जहां सिर्फ़ मूर्ति रखी हुई थी आज वहां उसके चारों ओर टीन शेड का घेरा है। मैनें अभिवादन से मूर्ति के आगे शीश झुकाकर प्रार्थना की मुद्रा में आंखें बंद कर ली हैं,ठीक वैसे ही जैसे कि मुझे शिशु मंदिर में संस्कार दिया गया था।
     "भगवान भला करे!"पुजारी जी मेरे माथे पर लाल बंदन का टीका लगाने के बाद आशीर्वाद दे रहे हैं
"औऱ पुजारी जी! कैसे हैं?"
    उनके बिछाये हुये टाट के बिस्तरे पर बैठते हुये मैनें यूँ ही पूछ लिया है,ताकि मुझे थोड़ी देर और हवा, मौसम का आनन्द प्राप्त हो। शहर के शोर-शराबे का भी यहां कोई असर नहीं है।
  "सब कुशल है भैया! जब तक जी करे बैठो"
पुजारी जी पके चावल निकले। मैं जो सोंच रहा था वो समझ गये। अपने जूते और जुराफों को इतनी दूर उतार कर आया हूँ कि यहां तक उनकी बदबू आकर माहौल न खराब करे। पैर भी जम के धुले थे दर्शन करने से पहले।
"टीन शेड से अब बढ़िया हो गयी मठिया पुजारी जी!"
"हां..वकील साहब का घर बन रहा है,सो उन्होंने ही इसे भी सही करा दिया"
"घर तो बना बनाया है वकील साब का फिर?"
"अरे वो पास के प्लाट में बन रहा है उधर, वो देखो,अबके बड़े बेटे की शादी है,अब बहू और सास एक मकान में नहीं रहते न भैया!"
  पुजारी जी मुस्करा रहे हैं। उनकी मुस्कान,इतनी उम्र में देखा गया पहला सबसे श्रेष्ठ व्यंग्य है। पीढ़ियों के बदलाव में आ रहे बिखराव और हम लग्ज़री होते लोगों पर पुजारी जी की मुस्कान एक चेतावनी है। चिड़िया अंडे से बाहर आयेगी, मां पाल पोस कर बड़ा कर देगी,फिर चिड़िया अलग घोंसला बना लेगी और वो माँ को भूल जायेगी, पर माँ उसे हमेशा यादों के फ्रेम में सज़ा रखेगी शायद।
   हवा तेज़ हो रही है,उसके अपने रंग है,गर्मियों की दोपहर वो बिगड़ैल सहेली है जिसका असर बेचारी हवा पर यूँ पड़ता है कि वो धूप से भी ज्यादा तेज चुभती है। संगत का असर पड़ता है,सब कहते थे,महसूस अब हुआ है। हवा अपनी बिगड़ैल सहेली के साथ आती है,पर उसका असर पेड़ों की छांव के साथ मिलकर और शीतल हो जाता है,छाँव, एक अच्छी सहेली है।
  "पाँय लागी पुजारी जी!"
एक अधेड़ आ रहें हैं। दो बच्चे उनके इधर-उधर सीमेंट की बोरियां समेटे चले आ रहे हैं।
"भगवान भला करे गोपी भाई! आओ बैठो..!"
पुजारी जी ने उनका अभिवादन करते हुये बैठने को कहा। मैं अभी तक हिला नहीं हूं और जिस तरह का माहौल है,लगता नहीं कि अब मैं हिल पाऊँगा।
"चलो..अपनी-अपनी जगह बैठ जाओ कल के जैसे..और आज भी मज़दूरी उतनी ही मिलेगी,लेकिन सुनो गुड्डा!अगर काम गुड़िया के बराबर होगा,तो बराबर पैसा मिलेगा वरना आज कटौती होगी,समझे!"
 अधेड़ ने दोनों बच्चों को उंगली दिखाते हुये कहा,मगर ये कहते हुये होंठों पर मुस्कान थी,यक़ीन करो सच में..हां वो मुस्करा रहे थे अभी..
"बाबा! गुड़िया की मदद मैंने ही की थी कल,इसीलिये इसके पास मुझसे ज्यादा धागे थे,ये छोटी है न बाबा! मम्मी बोलती हैं कि मुझे इसका ख़याल रखना चाहिये,अब आप बताइये मेरी क्या गलती?"
"चलो ठीक है,अब काम भी करो बतकट्ट!"
  पुजारी जी,अधेड़ के साथ उसकी मुस्कान में मिलकर आनंदित हो रहे हैं। मैं इसमें उलझा हूँ कि आखिर ये बच्चे क्या काम करते होंगे भला? और इस पिद्दी ने अपनी छोटी बहन का खयाल कैसे रखा होगा? ये अधेड़ इन्हें कितनी मज़दूरी देता होगा? अब उसी में से कटौती भी कितनी करेगा भला?
   मुझसे तीन फ़ीट की दूरी पर अधेड़ के साथ उसके दायीं ओर दोनों गुड्डा और गुड़िया सीमेंट की ख़ाली बोरियां बिछाकर बैठ गए हैं। अधेड़ ने बोरियों के सिरे काटने शुरू किये और दो-दो बोरियाँ दोनों को दे दी है। गुड्डा-गुड़िया दोनों अपना काम करने लग गये। वे छोटी-छोटी उंगलियों से बोरी के धागे अलग कर रहे हैं। अधेड़ ने एक चार नोक वाला लकड़ी का यंत्र निकाला है जिसके ऊपर की ओर एक हत्था है और हत्थे में छोटी सी लोहे की कील लगी हुई है। अधेड़ ,कुछ धागों को उसमें फँसाकर घुमाने लगा है। 
   मैं उन पिद्दियों की कार्य कुशलता देखकर हैरान हूं,इतनी छोटी सी उम्र में इन्हें तराशा जा रहा है,गुड़िया,गुड्डे से दो धागे ज्यादा खींच लेती है तो उछल पड़ती है,गुड़िया कोई धागा खींच नहीं पाती तो गुड्डा उसकी मदद कर देता है।हवा आकर गुड़िया के बाल बिगाड़ रही है,गुड्डा उन्हें बार-बार सही करने को कहता है। अचानक गुड़िया की आंखों में तेज हवा से धूल भर गयी गुड्डे ने तुरंत फूंक कर सही कर दिया और अब दोनों एक-दूसरे की ओर कुछ इस तरह मुंह करके बैठे हैं कि आने वाली हवा अब गुड्डे की पीठ तक ही पहुंच रही है। गुड़िया,गुड्डे की ओट में बैठी है। गुड्डा,एक जिम्मेदार भाई है गुड़िया,एक प्यारी बहन।
   मैं इन पिद्दियों में खुश रहने की क्षमता, कार्यकुशलता, एकाग्रता, बचपना, और बहुत कुछ देख रहा हूँ। ये,धागों के साथ खेलते हुये वीडियो गेम पर जीने वाली एक नस्ल की नाक खींच रहे हैं। मेरा मन अब नहीं रुक रहा,..
"बहुत प्यारे बच्चे हैं पुजारी जी! ये यहां कैसे? पहले तो कभी नहीं देखा"
पुजारी जी मुझे बहुत देर बाद अचानक सवाल करता देख मेरी ओर मुड़ गये हैं।उन्हें शायद पता था कि मैं यह ज़रूर पूंछने वाला हूँ
"ये यहां पहली बार आये हैं,तुम्हे भला कैसे नज़र आते? ये गोपी भाई के बेटे के बच्चे हैं। वकील साब के गांव से हैं ये लोग
पूरा परिवार है साथ में।"
"मतलब टहलने आये हैं यहां..अब समझा मैं!"
मैं हल्की मुस्कराहट का मज़ा लेते हुये बोला कि अधेड़ मुस्करा कर बोल दिया है..
  "तुम कुछ नहीं समझे भैया!..."
मैं फिर हड़बड़ा गया हूँ,और अब मैं जानने को उत्सुक भी हूँ..
"फिर..? आप सब टहलने नहीं आये"
"नहीं"
"तो???"
अधेड़ अपने काम में व्यस्त है उसने बताना जरूरी नहीं समझा शायद..पुजारी जी मुझे भांप गये हैं कि मैं रक्तचूसक प्राणी हूँ,वे बताने लगे,
"गोपी भाई का परिवार ही वकील साब का नया मकान बना रहे हैं,इनके परिवार के सभी सदस्य यहीं हैं"
   पुजारी जी की बात मुझे अब कुछ समझ आ रही है। वे और साफ कर रहे है,उन्होंने उंगली से इशारा करते हुए कहा.
"वो वहां देख रहे हो..हां.. ठीक वहीं..दूसरे पेड़ के नीचे सड़क पर सीमेंट वगैरह मिलाते हुए जो नौजवान दिख रहा है,वो इनका बेटा इन्दर है,और वो जो औरत देख रहे हो,सीमेंट,मिट्टी में सनी गुलाबी साड़ी पहने,जो गिट्टी-मौरंग से भरे तसले उठा रही है,वो इनकी बहू है।"
"अच्छा..अच्छा.."
 मै उत्सुकता को धीरे-धीरे कम कर रहा हूं।मग़र ये बच्चे मुझे सुकून नहीं लेने दे रहे।
"पुजारी जी! फिर ये बच्चे स्कूल वग़ैरह नहीं जाते?"
इस बार अधेड़ बोल रहा है,
   "जाते थे..अब नहीं जाते..इनकी ज़िन्दगी इनके लिये सबसे बड़ा सबक है"
   आवाज़ में अजीब कसमसाहट है। मैं गुत्थियों के आकाश में गुलाटियां मार रहा हूँ।
  "फिर ऐसा क्या हुआ? अब ये बच्चे क्यों नहीं जाते स्कूल?"
अधेड़ अपने काम में व्यस्त है,पुजारी जी एकटक निहार कर बोल रहे हैं
   "हरि इच्छा नारायण!..भैया..ज़िन्दगी है सब झेलना पड़ता है...अच्छा..अब मैं मंदिर की सफ़ाई कर दूं ज़रा..मन करे तो बैठो..आता हूँ"
   पुजारी जी मुझे ख़जूर पर लटका छोड़ कर अपनी मठिया में रखी मूर्ति को मज्जन क्रिया कराने गये हैं। मैं अनमने मन से उठकर चल पड़ा हूँ
"अच्छा चाचा,चलते हैं!"
  अधेड़ को हाँथ जोड़कर अभिवादन किया मैनें। दोनों बच्चों को अपनी मुस्कान तोहफ़े में दी है और उनकी कोमलता मेरे सीने में घर बना रहने लगी है।
     उसी दूसरे पेड़ के सामने से गुजरते हुये इन्दर और उसकी पत्नी को ताकता हुआ आगे निकल आया हूँ। करीबन सौ मीटर आगे।
   "कहाँ जायेंगे भैया?"
 एक ठेलिया चालक ने अभी-अभी मेरे सामने अपनी ठेलिया रोककर पूंछ लिया मुझसे। इस शहर से दुनिया के किसी भी शहर में आपका हाल कोई जिस पल पूछ लेता है, वो पल आपका उस फलां शहर में बिताए हुये खूबसूरत पलों में से एक होता है। ठेलिया चालक ने हरे रंग की टी-शर्ट और नीला लोवर पहन रखा है। घने घुंघराले बालों पर सीमेंट की सफेदी है।
  "बस क्रासिंग तक ही जाना है,पर आप कौन,क्यों रुक गए?"
"मैं आपको बहुत देर से देख रहा था, आप पुजारी काका और बप्पा(पिताजी) के पास बैठे हुये थे। मुझे अभी सीमेंट की बोरियां लादने जाना है गायत्री स्टोर तक..आइये आपको छोड़ देता हूं.."
  "अच्छा! तुम्हीं इन्दर हो?"
"हां"
इन्दर ने एक नई बोरी ठेलिया के पटरों पर डाल दी है जिससे मेरी पैंट सलामत रहे। ठेलिया अब धीरे-धीरे बढ़ चली है।
  "इन्दर भाई! आपके बच्चे बहुत प्यारे हैं"
  "अरे भैया!बहुत शैतान और शरारती हैं दोनों"
"वो तो होंगे ही आखिर बच्चे हैं,मगर एक बात बताओ तुम लोग यहां क्यों आये हो काम करने? ज़मीन-अमीन तो होगी न गांव में?"
  "थी..पर अब नहीं है"
  "क्या मतलब?"
 "तब मेरी शादी नहीं हुई थी,हमारे बाबा जी ने ज़मीन का बंटवारा कर दिया था।बप्पा दो भाई हैं। ये बड़े हैं। क़रीब दस एकड़ जमीन के दो हिस्से हुये। अचानक चाचा के बड़े लड़के का क़त्ल हो गया। बप्पा को जेल जाना पड़ा। कुछ रोज़ हम भी रहे थे जेल में और फिर.."
"फिर क्या...?"
"फिर चाचा ने हम दोनों को जेल से निकलवाया और कोर्ट- कचहरी के चक्कर में दसों एकड़ जमीन बिक गयी"
"हे भगवान!..उस लड़के को सच में तुम लोगों ने मारा था?"
"मारा तो नहीं था पर क्या होता है? ग़रीबी सच साबित नहीं कर पाती,इसलिये हम आज ऐसे हैं"
  "तुम्हारे चाचा ही तुमको क्यों छुटाए यार?"
"क्योंकि वो जानते थे कि असलियत क्या है?"
  "तुम्हारी ज़मीन किसने ली?"
" हमारे चाचा ने"
  "कौन है तुम्हारा चाचा?"
"यही वकील साब! जिनका हम घर बना रहे हैं"
    मेरा अचम्भापन चरम पर है। ये गुत्थी जहां थी वही है अब भी।
"रुको यार!आख़िर माजरा क्या है इन्दर भाई? मुझे कुछ समझ नहीं आया"
   ठेलिया रुक गयी है।क्रासिंग अब क़रीब सौ मीटर दूर है। इन्दर ने अपने बालों को संभाल कर सीमेंट झाड़ दी है थोड़ी,और मुस्करा रहा है।
  "ऊपर वाले का खेल है भैया! असल में वो क़त्ल नहीं आत्महत्या थी,जोकि उस लड़के ने अपने चरित्र के चलते की थी। चाचा जी ने उसकी जान को ज़मीन से अदा करने का खेल रचा और वे जीत गये..बस..सीधी सी बात है इसमें इतना क्या उलझना.."
  इन्दर ने अपनी बात पूरी कर दी है। इतनी बड़ी कठिनाई को इतनी आसानी से बयाँ करता है भला कोई?
   "और तुम लोग अब भी उस नीच का नया घर बना रहे हो,क्यों?"
"हम लोग मज़दूर हैं,काम मिलता है हम करते हैं,हमें काम से मतलब है काम किसका है इससे नहीं। बप्पा कहते हैं,दुश्मन जब हमें खुश देखते हैं तो उनके कलेजे पर सांप लोटते हैं,ये लड़ाई अभी जारी है,चलती रहेगी यूँ ही"
  इन्दर ने ठेलिया फिर से चलानी शुरू की है। मैं क्रासिंग पर उतर गया हूँ।इन्दर को जाते हुये देख रहा हूँ। अचानक उसकी टीशर्ट पर मेरी निगाह चली गयी है,जिसकी पीठ पर लिखा है,
    "भवन निर्माण की सर्वोत्तम वस्तु-मैं हूँ न"
छोड़ों भी,किसी सीमेंट कंपनी का प्रचार होगा बस..
 

Tuesday, 27 June 2017

चाँद! तुझे ईद मुबारक़

    पूरे एक महीने के रोज़ों के बाद शाम को सब ईद के चाँद का दीद करने इकट्ठे हुये थे।अभी-अभी मग़रिब की नमाज़ पढ़ी गयी।मौलाना साहब का अंदाज़ा है कि चाँद महज़ बीस मिनट के भीतर ही निकल आयेगा।सब ख़ुश थे।आसमान की ओर एक टक लगाये पूरा कस्बा छतों पर था। पंचायत टीले पर लगी भीड़ भी इसी दीद के इंतज़ार में थी। इस सबके बावजूद एक लालू ही था जो अपनी अन्धी अम्मा के साथ घर में क़ैद था। अम्मा बार बार कहती,"जा रे लालू! तू भी चाँद का दीदार कर ले। बड़े नसीब वालों को मिलता है उसका दीद, मुझ बुढ़िया को ही देख ले,अल्लाह ने जब तक चाहा जी भर दुनिया देखी ,चाँद देखा,ईद की दावतें उड़ाई,और अब जब आंखों से रौशनी ही रुख़सत हो गयी तो दुनिया का क्या!ख़ुद का भी दीद नहीं होता। तू जा न! अब भी बैठा है।"
  "अम्मा! क्यों इतना परेशान हो रही है? जब चाँद दिखेगा तो सारा क़स्बा ख़ुशी से झूम उठेगा,हमें भी मालूम चल जायेगा।जाना कोई ज़रूरी तो नहीं" लालू दलीलें देकर अपना काम करने लगता। अम्मा उठकर चारपाई पर लेंट गयीं।
   "हां.. हां.. ठीक है...अब न जा कोई बात नहीं! मेरे कहने से क्यों जायेगा? जाता तो तू ख़ूब था,चाँद का दीद भी करता था और चांद की रात हमेशा देर से लौटता भी था।अब न जाने क्या हुआ? लेकिन ये जान ले मेरे बच्चे! मैं तेरी अम्मा हूं,सब मालूम था मुझे!तब भी,और आज भी,सिर्फ़ आंखें नहीं रहीं तो क्या?अपने लाल का दर्द तो महसूस ही होता है न"
   लालू छलक उठा। मज़ाकिया अंदाज़ में ख़ुद को ख़ुद में कैद कर अम्मा को समझाने लगा,
    "अम्मा!!! ये तू क्या बफले जा रही है? तब दिन कुछ और थे,अब वो नहीं रहे। बच्चा था तब मैं अम्मा। अच्छा मुँह खोल दवाई पी ले।"
    सर में हाँथ लगाकर उठाया और चम्मच में घोली दवाई अम्मा को पिलाकर फिर से लिटा दिया।
  "चल अब सो जा अम्मा!कल ईद है मुझे बड़ी मेहनत करनी है। सारे मेहमान इकट्ठे होंगें,उनके इस्तक़बाल का इंतज़ाम भी तो करना है न।"
  "हां में सो जाऊंगी,पर तू एक बार चाँद..."
    अम्मा का दिल नहीं मान रहा था,पर लालू बीच में टोंकते हुये बोला,
   "क्या अम्मा! अब तुम सो जाओ,चाँद जल्द ही आने वाला है,पता चल जायेगा।"
   "जैसी तेरी मर्ज़ी...वैसे अब मेरी आँखें तू ही है न बेटा! सो कह दिया..नहीं जाना चाहता,तो मत जा.."
हमेशा से बन्द आंखों को अम्मा पलकों से ढकते हुये,चारपाई की पाटी पकड़ लेट गयी। लालू बर्तन समेटने लगा।कुछ सफाई करनी थी सो झाड़ू उठाया ही था कि साबिर आ धमका।बड़ी हड़बड़ाहट में घर के अंदर शरीक हुआ।
    "अबे लालू! कहाँ हो बे?"
"हां आता हूँ रे! ठहर ज़रा"
  हाँथ में झाड़ू लिये लालू सामने आया,
   "क्या हुआ? क्यों गला फाड़ रहा है? चाँद तेरी छत पे गिर पड़ा क्या जो इत्ता ख़ुश हुये जा रहा है"
  "अरे नहीं रे! फ़िज़ूल का बक़वास मत कर। चल मेरे साथ अभी"
  "पर कहाँ भाई"
  "अरे तू चल तो सही फिर बताऊंगा"
  "रहने दे,मुझे कहीं नहीं जाना यार! तू जा न,अम्मा भी बोल-बोल के थक गई,वैसे भी मुझे बहुत काम है,तू जा रे"
  "अरे काम फिर कर लियो,अभी चल तो सही तुझे दिखाना है कुछ"
  "बतायेगा भी कुछ कि सिर्फ भड़भड़ाता ही रहेगा,ऐसा क्या दिखायेगा तू मुझे?"
   "वो क्या है कि,उसे मैं अपने लफ़्ज़ों से बयाँ नही कर सकता,लेकिन इतना पक्का है मेरे जाँ नशीं!तू दीद कर उछल पड़ेगा"
   "अच्छा!!!! अगर फ़िज़ूल कुछ हुआ तो?"
   "अल्लाह क़सम! जान ले लेना मेरी जान! तू चल तो सही"
साबिर ने झाड़ू हाँथ से छीनकर आंगन में हीं फेंक दिया।हाँथ पकड़ कर साथ चल दिये दोनों।
    "हाँथ छोड़ मेरा! अब मैं बच्चा नहीं रहा रे"
   लालू ने साबिर का हाँथ झटकते हुये कहा। साबिर रिश्ते में लालू का चचाजान लगता था। बचपन में अक्सर लालू का हाँथ पकड़कर चलने की आदत थी साबिर की,सो आदत न गयी अब तक।उम्र में कोई खासा अंतर न था यही कोई दो बरस ही बड़ा होगा साबिर लालू से। दोनो की ख़ास बात ये थी कि दोनों ही माह-ए-रमज़ान के मुबारक़ वक़्त में दुनिया मे तशरीफ़ लाये थे।लालू चौथे रोज़े के दिन का था और साबिर पंद्रहवें रोज़े के दिन का। यारी-दोस्ती सारी कहावतें बौनी हैं इनके।ये रिश्तेदार कम यार ज़्यादा हैं।
  "अच्छा बेटे! अब ये तू मुझे बतायेगा? अरे मुझे तेरे अलावा भी कुछ याद है, तू जिस दिन पखाना अकेले जाना सीखा था,उस दिन से आजतक,सब जानता हूँ मैं,अबे! चचा हूँ तुम्हारा भूलो न"
   साबिर कभी-कभी मसखरी कर देता था,चचा होने के नाम पर। दोनो मुस्करा उठे। चौराहे से दायीं ओर मुड़ते ही लालू सहम गया।
   "अरे मेरे चचा! किधर जा रहे हो ज़नाब? जानते हैं न आप कि वो किसका मोहल्ला है? जीते जी ज़न्नत दिखाओगे आप,अल्लाह क़सम"
    साबिर मुस्कराया,"अरे जानता हूँ न मेरे बच्चे! इधर मेरे लालू का चाँद रहता है,जिसका दीदार उसके लिए ज़न्नत से भी बढ़कर है,और ईद मनाने के लिये चाँद का दीद ज़रूरी होता है न जाँ नशीं!फिर किस बात का डर? चाँद का दीद करना कोई गुनाह तो नहीं है न! कल पूरी दुनिया ईद मनायेगी तो क्या मेरा लालू नहीं मनायेगा?"
   अचानक लालू की आंखों में आँसूं आ गये। उसका कल उसकी पीठ से उधड़कर उसकी हथेलियों में आ गिरा।
  "सच कह रहे हो न चचा?"
  "नहीं तो! तुझे रुलाने से मुझे ख़ुशी मिलेगी न पगले! यकीन नहीं होता तो चल"
  "क्या सच में.....?"
  लालू की ख़ुशी आंखों में यूं छलकी की ज़ुबान और गले ने अपना दम तोड़ दिया।
  "हां रे! साफ़िया शहर से लौट आयी है। उसके घर पे वो अपना ज़ाकिर है न अरे वो ड्राइवर ज़ाकिर,उसी ने घर आते ही बताया..जैसे ही पता चला में दौड़कर तेरे पास आ गया..अब चल देर मत कर,वरना चाँद निकल आया तो तेरा चाँद ग़ुम हो जायेगा.. चल"
    लालू,साबिर के गले लिपट पड़ा।दोनों की आंखें नम थी। बचपन से अब तक के वो हसीन दिनों की खट्टी-मीठी यादें आंसुओं से बह रहीं थी। साफ़िया इन आंसुओं का वो क़तरा थी जिसे लालू कभी अपनी आंखों से बह नहीं पाया।बारवें दर्ज़े तक साथ में पढ़ते हुए दिन कब गुज़रे थे? पता ही नहीं चला। मग़र जबसे साफ़िया आगे की पढ़ाई के लिये शहर गयी है,हर पल बोझ सा जिया है लालू ने। लालू को बस उसकी आख़िरी कही बात याद रहती थी,
    "लालू में लौटकर जल्दी ही आऊँगी.. फिर हम दोनों साथ में लुका-छिपी खेलेंगें।"
  लालू अकेले ही इस बात को याद कर हंसता और जब ग़म बढ़ जाता रोने लगता। लालू ख़ुश न रहता तो साबिर को खुशी कैसे सुहाती? साबिर ने शादी की,बच्चे हुये..पर जो खुशी लालू को वो देना चाहता था,शायद आज वो उसे देने में कामयाब हो पायेगा।
  "ए नौटंकी! चल अब वरना सब गुड़ गोबर हो जायेगा यहीं"
साबिर ने संभलते हुये लालू के आँसूं पोंछे। लालू अब बहु कुछ सहम हुआ सा था।
   "साबिर! यार क्या नवाबों के मोहल्ले इतनी रात गये जाना ठीक रहेगा?
     "अमा यार लालू खामखाँ घबरा रहा है।इंसान ही हैं,चाट थोड़े ही जायेंगे,और फिर कह देंगे कि हमारी बस्ती से,आपकी बस्ती में चाँद का दीद जल्दी होता है,बस तू चल अब घबरा मत"
   "मग़र... यार..."
  "अब ये अगर-मग़र बाद में करना,चल पहले"
दोनों अब नवाबों के मोहल्ले में दाख़िल हो चुके थे। साफ़िया के मक़ान के आगे बने चबूतरे पर जमात लगी हुई थी।सब चाँद के इंतज़ार में बैठे अपने-अपने अंदाज़, राज़,अल्फ़ाज़ बयान किये जा रहे थे।बुज़ुर्गों की भीड़ से अलग जवान लोगों की टोलियां अपनी लफ़्फ़ाज़ी में मशरूफ़ थीं। साबिर ने ज़ाकिर ड्राइवर की कमीज का कोना खींचा। उसने मुड़कर देखा,भौचक देखता ही रह गया,हड़बड़ाहट में बोला,
   "अमा मियाँ साबिर तुम ?इस वक़्त? मरवाओगे क्या? घर में तसल्ली न हुई तुमसे।
  "अमा ज़ाकिर भाईजान! न जाने कितनी ईद तसल्ली करते-करते  गुज़र गयीं इस मखदूम लालू की,और अब इसकी तसल्ली इसके सामने है,तो इसकी तसल्ली को भी तस्सली मिल जायेगी।तुम बस हमारे खड़े होने का इंतज़ाम ऐसी जगह करो कि इस मुफ़लिस को अपने चाँद का दीदार हो जाये,दुआ मिलेगी।"
   "अमा मियाँ सठिया गये हो तुम! मालिक को पता चल गया तो ख़ाल खिंचवा देंगे हमारी और नौकरी जायेगी सो मुनाफे में...न हमसे न होगा.."
  "अबे मान भी जा ज़ाकिर! अल्लाह कसम तुझ पर उठने वाली आंखे निकाल लूंगा,बस एक बार मान जा यार.."
ज़ाकिर नज़रे झुकाये "न-न"किये जा रहा था। लाख कोशिशों के बाद भी तैयार न हुआ।
  "चल ठीक है! तू मत बता..हमें जहाँ से इसका चाँद नज़र आयेगा वहीं जम जायेंगे.. जान थोड़े ही ले लेगा कोई..चल रे लालू"
   साबिर को तैस आ गया। लालू के हाँथ खींचकर उसे आगे की ओर चलने के लिए धकेेल दिया। ज़ाकिर ने लालू के हाँथ पकड़ लिया,"सुन! तेरी मोहब्बत अपनी जगह है और ज़िन्दगी अपनी जगह,सोंच ले"
    "ज़ाकिर भाई, अगर कुछ सोंचना ही होता तो दिमाग चलता न,लेकिन दिमाग ने आज दिल से हार मान ली है और दिल साल रोज़ा रख के बैठा है,जब तक चाँद नहीं दिखाई देता रगों को खून की इफ्तारी न मिलेगी।"
  लालू फिर सेे छलक पड़ा।
  "अच्छा-अच्छा ठीक है,जाओ! उधर नीम के चबूतरे के पास खड़े हो जाओ,साफ़िया मेडम सबसे ऊपर वाली बालकनी में खड़ी होंगी"
ज़ाकिर पिघल गया।दोनों बढ़े ही थे कि उसने फिर रोका,
  "और सुनो!कोई पूछे तो कहना ज़ाकिर के साथ आये हैं"
   "शुक्रिया ज़ाकिर भाई"
  साबिर के कंधे पर हाँथ रखे लालू चल तो रहा था मगर उसकी आँखें अपने चाँद को ढूंढ रही थीं।दोनों चबूतरे के पास पहुंचे।ये लफ़्फ़ाज़ों की जमात थी।अचानक पता नहीं क्या हुआ कि,लफ़्फ़ाज़ों में हलचल मच गई।इस भीड़ की हिस्से में दो दोस्त ख़ुद को छिपाने में मशरूफ़ थे।इसी बीच कुछ बातें होने लगीं।
     "अबे जानता है,नवाब साहब की बहन शहर से लौट आयी है,सुना है बहुत पढ़ी-लिखीं हैं"
  "अबे ज़ाहिल!पढ़ने ही तो गयीं थी वो शहर को,लेकिन एक बात और जानते हो शहर में रह के भी नये ज़माने के रंग नहीं चढ़े उनपे। सुना है,आज भी ख़ानदानी सलवार सूट ही पहनती है"
  "अमा ये सब छोड़ों मियाँ,सबसे बड़ी बात ये है कि वो जितनी प्यारी लगती थी अब उससे भी सौ गुना क्या हज़ार गुना और खूबसूरत हो गयी हैं,सच ही है। ऊपर वाले के रहम-ओ-करम का नतीज़ा है ये सब,जिसे परोसता है दोनों हाँथों से परोस देता है।"
   मग़रिब की अज़ान के बाद से लगभग बीस मिनट होने को हैं,मग़र चाँद अभी तक नहीं दिखा,लोगों में बेचैनी बढ़ गयी।सबकी नज़रें आसमान में टिकी थी। इस दुनिया से दूर लालू की आंखें नवाब साहब की ऊपर वाली बालकनी को ताकते हुये अपने चाँद का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहीं थीं।पीली-गुलाबी बत्तियों से रौशन वो बालकनी लालू को रंगीन सितारों से सज़ा आसमान नज़र आया,बस कमी थी तो चाँद की।
     "वो देखो चाँद निकल आया,मुबारक़ हो"
  साफ़िया के बालकनी पर आते ही लालू ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाया। सबकी नजरें उसकी तरफ मुड़ गयीं।साबिर सहम गया। ऐसे मुबारक़ मौक़े पर भला ऐसा भद्दा मज़ाक कौन बर्दाश्त करेगा? उसने लालू को डांटते हुये वक़्त की नज़ाकत अपने हिस्से की,"अबे सठिया गया है! चाँद निकलता तो सबको दिखता न! बड़े आये..मुंह बंद रख अपना..दो चमाट देंगे नहीं तो..."
   बालकनी पर खड़ी साफ़िया ने आसमान की तरफ उंगली उठाई। उसके इशारे के साथ सबकी नजरों ने हमकदमी की और यक़ीनन चाँद निकल चुका था। बस,खुशियों का सिलसिला शुरू हुआ,लोग आपस में गले मिलने लगे।नवाब साहब ने सबको रुकने के लिये पहले ही कहलवा दिया था,और उन्होंने शहर से लाये हुये खजूर भीड़ में बंटवाने शुरू कर दिये।
  इधर लालू इस सोंच में था कि "साफ़िया तो उजाले में थी सो दिख गयी पर उसे ये कैसे पता चले कि मैं भी यहां हूँ?"
    साबिर ने उसके चेहरे की तरफ़ देखा।उसके कुछ कहने से पहले ही बोल पड़ा,"क्या सोंच रहा है? अबे ये सोंचने का वक़्त नहीं है,कुछ करते हैं ताकि तेरा पैग़ाम उस तक पहुंच जाये"
    "मग़र वो कैसे चचाजान?"
  "अरे तू देखते जा मेरे बच्चे!जैसा मैं बोलता हूं करते जा"
  लालू ने मंजूरी से सिर हिलाया। साबिर ने उसे ज़ोर का धक्का मारा अब वे दोनों बाहर लगी पीले बल्ब की बत्ती के उजाले में थे।दोनों आपस में एक-दूसरे पर चिल्लाने लगे।
   "अबे मैं कह रहा हूँ न तो मानता क्यों नहीं? ऐसा नहीं हैं"
  "अबे तुझे मालूम भी है कुछ! ऐसा ही है पक्का.."
बहस बढ़ती गयी। देखते-देखते बात मार-पीट तक उतर आई।सारी भीड़ इकट्ठी हो गयी।ज़ाकिर मियाँ को भी ख़ुद का हश्र सोंच कर पसीने आ रहे थे।"नहीं है,है" ही सुनाई दे रहा था बस। किसी बुज़ुर्ग ने टोंकते हुये कहा,
"आख़िर बात क्या है?क्यों इस मुबारक़ मौके पर इस क़दर लड़ रहे हो?"
   एक दूसरे का गलेबान छोड़ कर दोनों दूर हो गये।साबिर बोला,
  "अरे चाचा! इस पगलेट से मैंने पूछा कि चाँद देर से क्यों निकला? तो जानते हैं क्या बोला? कहता है चाँद भी किसी चाँद के दीदार के इंतज़ार में था। बेअक्ल,बैलबुद्धि..."
  सब खिलखिलाकर हंस पड़े।बालकनी पर खड़ी साफ़िया मुस्करा रही थी। दोनों यारों की मेहनत बेकार न गयी।लालू से पूछा गया,
   "तो इसमें लड़ने की क्या बात थी?"
  लालू बोला,
   "यही तो..! ये ज़नाब कहते हैं चाँद भला किसका दीदार करेगा? वो तो ख़ुद चाँद है,मैं इन्हें यही समझा रहा था कि इश्क़ चाँद को भी किसी दूसरे चाँद से दिल लगाने को मजबूर कर देता है,भले ही चाँद ने सिर्फ़ किसी तारे से ही इश्क़ कर लिया हो मग़र उस चाँद के लिये उसका महबूब उससे भी बढ़कर है।"
    जवानों ने खूब हो हल्ला मचाया मग़र कुछ बूढ़े खीझ गये। उनमें कुछ बूढ़े थे,जो कभी जवान रहे थे उन्हें भी ये बात अच्छी लगी।उन्होंने बात को कुछ यूं रफ़ा-दफ़ा किया,
   "चल ठीक है मजनू की औलाद! अब घर जाओ अपने,इश्क़ न सिखाओ हमें,इश्क़ हमारे भी लहू में था,आज भी है,चलो जाओ रे!"
   दोनों घर की ओर चल दिये। लालू के क़दम ही न बढ़ रहे थे। उसके लौटने से पहले ही साफ़िया बालकनी से जा चुकी थी,और ये उसे नाग़वार गुजरा। दोनों टहलते हुये चौराहे तक आ गये। खामोशी कस्बे को आगोश में समेटे थी।लालू बोल पड़ा,
  "अमा साबिर!"
   "हां बोल!"
    "कितना अच्छा होता जो साफ़िया साथ होती?"
   "हां बिल्कुल...ख़्वाब अच्छा है!"
  "नहीं में हक़ीक़त की बात कर रहा हूँ कि, काश! हम आपस में ढेर सारी बातें कर पाते। काश! उससे शहर में बिताए गये दिनों के किस्से सुनता और उसके न होने पर गांव में बिताये गये ख़ुद के बुरे दिनों की दास्तान सुना पाता उसे..काश!"
  इंसान की ख्वाहिशें कभी नहीं मरतीं। जितना हासिल हो जाता है और भूख बढ़ जाती है।लालू ने लंबी सांस लेते हुये अफ़सोस का"काश" ज़िगर के किसी कोने में बिठा लिया।
   "बस कर भाई! तू ये काश-काश के चक्कर में मुझे सांस नहीं लेने दे रहा।"
  साबिर थका महसूस करने लगा। चौराहे के ठीक बीच में बैठ गए दोनों। चाँद आसमान चढ़ता जा रहा था और लालू ख्वाब बुनते जा रहा था।अचानक दो परछाइयां इन्हें अपनी ओर बढ़ती दिखाई दी।
     "चाँद का दीद मुबारक़ हो"
  लगभग दस ग़ज़ दूर से आयी आवाज़ के साथ दोनों परछाइयां इन दोनों के करीब आ रही थीं। साबिर काँपती आवाज़ में जवाब देते हुये उठ खड़ा हुआ,
   "आपको भी! मगर माफ करियेगा,हमने आपको पहचाना नहीं"
   "कैसे पहचानेंगें चचाजान? अरसा बीत गया आवाज़ सुने हुये"
  साफ़िया,ज़ाकिर की बेग़म के साथ चौराहे तक लालू से मिलने आ पहुंची थी।साबिर और लालू को तो यक़ीन ही नहीं हो रहा था। लालू ने ऊपर वाले का शुक्र अदा किया,
   "या मेरे मौला! तू सबकी फरियाद सुनता था ये तो मैं जानता था मग़र इतनी जल्दी मेरी दुआ क़ुबूल होगी मैंने ख़्वाब में भी न सोंचा था।"
    "अबे धोखे की तरह खड़ा ही रहेगा,अपने ख्वाब का बढ़कर इस्तक़बाल भी करेगा"
  साबिर ने लालू को आगे बढ़ने के लिये कहा और ख़ुद चौकसी पर खड़ा हो गया।
    साफ़िया और लालू उस चाँद की हल्की रौशनी में एक दूसरे को ताक रहे थे। आंखों से इंतज़ार झरकर सीने तक आ पहुंचा। दो आवाज़े आयीं...
   " सफ्फू....मेरी सफ्फू..तू आ गयी..चल दोनों लुका-छिपी खेलते हैं"
    "हाँ मेरे लल्लू...बहुत दिन हुये एक-दूसरे में ग़ुम हुए"
    
     दो चाँद गले मिल गये, जो अब तक अधूरे थे पूरे हो गये। दो वक़्त एक जगह आकर ठहर गये। दो गुज़रे हुये कलों ने आज के सामने घुटने टेक दिये। दो चाँद अब ईद मना रहे हैं ये कहते हुये....
   "मेरे चाँद, मुझे तेरा दीद मुबारक़,दुनिया तुझे तेरी ईद मुबारक़"
      
   

Friday, 24 June 2016

भूख और मज़हब

 शहर में बड़ी चहल पहल थी।सभी धार्मिक स्थलों पर आज कुछ ख़ास भीड़ भाड़ थी।जगह जगह लोगों ने स्टाल लगा रखे थे।लाउडस्पीकरों की वजह से माहौल संगीतमय था।आने जाने वाले हर मुसाफिर को लोग रोक रोक कर प्रसाद दे रहे थे।कहीं किसी स्टाल पर पूड़ी-सब्जी तो कहीं शरबत कहीं हलवा जैसे बहुत सी खाने पीने वाली चीजे बांटी जा रही थी।बड़ी-बड़ी कारों से उतरकर भी लोग भीड़ होते हुये भी प्रसाद का मजा ले रहे थे।आज इंसान,इंसान पर इसलिए मेहरबान था क्योंकि आज जेठ महीने का पहला मंगल था।जिसे बड़ा मंगल कहते हैं।
शहर में किराये से रहने वाले लोगों ने तो आज अपने घर में चूल्हे भी नही जलाये।घर से निकलकर एक एक करके कई जगह खाते और जब पेट भर जाता तब ज़ेब से पॉलीथिन निकालकर उसमे किसी और के नाम का झांसा देकर अपने शाम के भी खाने का इंतजाम करके वापस चले जा रहे थे।कुछ औरते भी इसी क्रम को दोहरा रही थी।वो भी आज खुश थी और हो भी क्यों न...चूल्हा औरत के लिए आजकल समस्या जो बन गया है और कम से कम कुछ तो राहत मिली आज।सारे शहर के ऐसे माहौल में शायद ही कोई भूखा रहता।
           झुग्गियों में रहनेवाले लोग भी जी भर खा रहे थे।औरते,बच्चे,बूढ़ा,जवान हर कोई पेट भरने के बाद जी भर दुआयें दे रहे थे।इन झुग्गियों में हर धर्म के लोग रहते थे।जो हिन्दू थे वे खाने के बाद झिल्लियों में भी ला रहे थे और कुछ मुसलमान भी इसमें शामिल थे उन्हें भी आज अपनी और अपने परिवार की भूख मिटाने का अच्छा मौका मिल गया।वे ऊपर वाले का शुक्रिया अदा कर रहे थे क्योंकि आज उन्हें रोज की तरह खाने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
          इन्ही झुग्गियों में से एक झुग्गी सफ़क़त मियां की थी।पेशे से रिक्सा चालक सफ़क़त का परिवार आज मुश्किलों से घिरा था।उसके परिवार में दो बच्चे एक बीवी को मिलाकर कुल चार लोग थे।उसके परिवार का भरण-पोषण एक रिक्से से होता था।एक हफ्ते पहले अपने लड़के के इलाज़ के लिए रिक्सा गिरवीं रखा था।आज उसके रक़म लौटने का समय ख़त्म हो गया लेकिन वो रकम नहीं दे पाया।उसके परिवार का सहारा छिन गया।
   सफ़क़त के बेटे आज़म ने अम्मी को आवाज़ लगाई,"अम्मी!कुछ खाने को दो।बड़ी ज़ोर की भूख लगी है।"
"अच्छा!रुक ज़रा।अभी कुछ देती हूँ।"गोद में पड़ी सात महीने की बेटी को सँभालते हुये शकीना दबे स्वर से बोली।
   शकीना झुग्गी के बाहर उदास बैठे सफ़क़त के पास आकर बोली,"ए जी!सुनते हो,ऐसे बैठने से क्या होगा?आजम को भूख लगी है।वो कुछ खाने को मांग रहा है।"
 "तो उसे कुछ खिला न!मुझे क्या बताने आई है?"सफ़क़त ने उसकी और देखा तक नहीं।वह सिर झुकाये अपनी किस्मत को कोश रहा था
 "क्या खिलाऊँ उसे?घर में एक दाना नही है।जो चावल थे कल रात में ही ख़त्म हो गए।इस पखवारे तुम लाये भी कहाँ कुछ?साग-सब्जी तो दूर,नमक तक नहीं है।"शकीना यह कहते ही फफक-फफक कर रोने लगी।
 सफ़क़त इतना सुनते ही चौंक पड़ा।उस पर जैसे कोई पहाड़ टूट पड़ा हो।न जाने कितने सवाल उसके आसपास मंडराने लगे।वह सोंच नहीं पा रहा था की अब वह अपने परिवार की भूख कैसे मिटाये?
 "देख शकीना!अल्लाह हमारी कुछ मदद ज़रूर करेगा।धीरज रख।"सफ़क़त ने उसे सम्भालने की कोशिश की।
  "इन बातों से पेट नही भरता जी!अभी उसकी तबियत भी नही सुधरी और अब भुखमरी की नौबत आ पड़ी।हम तो पानी पीकर भी दिन गुज़ार लेंगे मगर आजम को क्या कहोगे?"
    "नही शकीना!हम कुछ करते हैं। मगर करें भी तो क्या?"
सफ़क़त मियां को समझ नही आ रहा था की अब वह क्या करें?
  शकीना की नज़र सामने से आते ढिल्लू पर पड़ी।हाँथ में कई झिल्लियाँ लिए ढिल्लू झूमता चला आ रहा था।ढिल्लू के पास आते ही शकीना से रहा न गया।उसने पूछा,"ढिल्लू भैया!का ले आये इतनी झिल्लियों में?"
  "अरे का का बताये भाभी।बहुत कुछ लाये हैं।आज तो हम लोगों की मौज है।"ढिल्लू अपनी झुग्गी की ओर बढ़ चला।सफ़क़त की झुग्गी के दांयी वाली झुग्गी उसी की थी।शकीना चुप चाप बैठी थी।सफ़क़त भी जैसे ठगा हुआ सा बैठा था।
  अपनी झुग्गी में पहुँचते ही ढिल्लू ने अपने बीवी बच्चों को ज़ोर की आवाज लगायी।उसकी झुग्गी की सारी आवाजें शक़ीना के कानों तक पहुँच रहीं थी।
 ढिल्लू ने हँसते हुए अपनी बीवी से कहा,"अरे ओ कान्हा की मम्मी!लो आज जी भर खाओ और खिलाओ अपने बच्चों को।आज भगवान की कृपा बरस रही है।जरा देखो तो,क्या-क्या है?"
  "अरे वाह कान्हा के पापा!आज तो तुमने कमाल कर दिया।हलवा,पूड़ी,सब्जी,बूंदी,कढ़ी,चावल,खीर,...कहाँ से लाये ये सब?"झिल्लियाँ खोलते हुए ढिल्लू की बीवी ने संदेह से पूछा।
   "कहीं चोरी नहीं की है री!"ढिल्लू ने जवाब दिया।"आज बड़ा मंगल है तुझे पता भी है!पूरे शहर में आज जगह-जगह पर  भंडारे चल रहे हैं।गरीब-अमीर,फ़क़ीर,जवान,बूढ़े,बच्चे सबको भंडारे में प्रसाद के तौर पर खाना मिल रहा है।मैं भी वही से लाया ये सब।"ढिल्लू ने फ़टे बोरे पर बैठते हुए कहा।
  "अच्छा जी!बड़ा नेक काम है भूखे को रोटी मिल रही है,प्यासे को पानी मिल रहा है, वरना हम जैसे गरीबों को तो फटकार और दुत्कार के सिवा कुछ नही मिलता।शुक्र है ऊपर वाले का..."ढिल्लू की बीवी ने खाना परोसते हुए भगवान को धन्यवाद के शब्द कहे।"आओ जी आप भी खा लो"।
  "तुम सब खाओ।मेरा क्या है?भूख लगेगी तो फिर किसी भंडारे में जाकर खा लूंगा।"ढिल्लू के ठहाकों के साथ पूरा परिवार हंस उठा।
  शकीना का मन अब बार-बार कह रहा था की वह आजम के अब्बू को भंडारे में भेज दे।वो मन ही मन ही सोंचे जा रही थी।
                 "पूरा शहर पा रहा है तो क्या हमे नहीं मिलेगा?क्या हम इंसान नही हैं?"
लेकिन वह जानती थी की सफ़क़त कभी उसके कहने से हिंदुओं के भंडारे में नही जायेंगें।
     "नहीं जायेंगे तो न जायें मैं खुद चली जाऊँगी।आखिर कब तक आजम को भूखा रखूंगी?मेरा मज़हब मेरी औलाद को खाना देना है ,उसकी देखभाल करना है ।मैं मुसलमान हूँ तो क्या इन्सान नहीं?क्या वे,जो खाने-पीने की चीजें बाँट रहे हैं मुझे नहीं देंगें?"
    वह सोंच ही रही थी की अचानक किसी ने उसका हाँथ पकड़ते हुए कहा,"अम्मी!"
यह आजम था।"कुछ खाने को दो न!बहुत भूख लगी है।"
   शक़ीना फिर रो पड़ी और गुस्से से बोल उठी,"जा कहीं मर! किसी से भीख मांग...और मिटा ले अपनी भूख...दुनिया बहुत बड़ी है कहीं भी चला जा..मैं अब तुझे नहीं खिला सकती...अल्लाह जब पैदा करता है तो खाने का भी इंतज़ाम कर देगा...दूर हो जा मेरी नजरों से..."
  शक़ीना की हालत देख सफ़क़त बोला,"पागल हो गयी है क्या?दो चमाट मारूँगा होश ठिकाने आ जायेगा..कोई अपनी औलाद से भला ऐसा सलूक करता है...।"सफ़क़त ने आजम को गोद में उठा लिया।
         "अब्बू!अम्मी ऐसा क्यों बोल रहीं हैं?क्या इनकी तबियत ख़राब है?मैंने तो सिर्फ खाना माँगा था।"तेरह साल के आजम ने अपने सवालों से सफ़क़त को हैरान कर दिया।
  "कुछ नहीं हुआ मेरे बच्चे अम्मी को.....जा....जा तू थोड़ी देर कहीं खेल कर आ...मैं तब तक कुछ खाने के लिये लेकर आता हूँ..जा..।"आजम को गोद से उतारते हुए सफ़क़त ने उसे बहलाने की कोशिश की।भूख से तड़पता आजम धीरे धीरे क़दमों से झुग्गियों के बीच चला जा रहा था।
  कुछ देर तक शक़ीना और सफ़क़त एक दूसरे को देखते रहे।"पगली!तुझे क्या हो गया है?ऐसे कोई भला नाराज होता है।अल्लाह ने तक़लीफ़ दी है तो दाने-पानी का जुगाड़ भी देंगे।तू सब्र रख.."
  "सब्र रखूं..लाओ सब्र को गोद में रखूं...सब्र को ओढ़ना बनाऊं..सब्र का बिछौना बनाऊं...सब्र से चूल्हा जलाऊँ...हुँह..सब्र रखूं...सब्र का क्या  करें बताओ.. सब्र से आजम की भूख तो नहीं मिट सकती...अल्लाह ने ये कैसी ज़िन्दगी दी है...और सब तो दूर खाने के भी मोहताज हो गए हम...अब...अब..."शक़ीना ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।सफ़क़त को कुछ समझ नही आ रहा था कि अब कैसे अपने परिवार को संभाले?शक़ीना तो अपने बच्चों के लिए बहुत परेशान थी क्यों न हो दुनिया में इससे बड़ा ग़म और क्या होगा की वो ज़िंदा हैं? और उनकी औलाद भूख से तड़प रही थी।
  शक़ीना कुछ देर चुप रही।हिम्मत जुटाकर बोली,"सुनो!"
"हाँ बोलो शक़ीना!"
"देखो ढिल्लू कहीं से ढेर सारा खाना झिल्लियों में लेकर आया था।आप भी क्यों नहीं ले आते?वो कह रहा था सबको मिलता है।तो हमे क्यों नहीं मिलेगा?"
"हमें मिलेगा...उन हिंदुओं के भंडारे में...तू पगला गयी है..."
सफ़क़त ये कहकर मुस्करा उठा।
  "तू जानती भी है की क्या है आज?हिंदुओं के किसी देवता की पूजा है..और हम ठहरे मुसलमान...वो भी पक्के मुसलमान.....हिंदुओं के भंडारे में खायें तो मज़हब और ईमान का क्या होगा?दोज़ख़ में भी जगह न मिले.."
  "अच्छा! वो हिन्दू हैं...हम मुसलमान हैं...देवता उनके..अल्लाह हमारे..या अल्लाह...!"
उसने आसमान की ओर दुआओं भरे हाँथ उठाये।
   "या अल्लाह!ये हिन्दू-मुसलमान कहाँ से आ गये तूने तो इंसान बनाये थे अब तुझे दर्द होगा न!इंसान तो मर गये...कुछ हिन्दू बचे हैं,कुछ मुसलमान..."
 शक़ीना रो रही थी।सफ़क़त सर पकड़कर बैठ गया।गोद में पड़ी सात महीने की मुन्नी अचानक रो उठी।शक़ीना ने उसे दूध पिलाना शुरू किया।झुग्गी के अंदर जज़्बाती माँ,मज़हब के आगे मज़बूर बाप और ख़ामोशी थी।
   "अम्मी!"
   बेरहम ख़ामोशी को चीरती हुई एक प्यारी आवाज़ आयी।
ये आज़म था।दोनों हांथों में कई झिल्लियाँ पकड़े वो अंदर घुसा।
 "अम्मी!मैं खाना ले आया और पता है अब्बू को हलवा पसन्द है न मैं वो भी लाया...मैंने पेट भर के खाया भी...लो..अब तुम और अब्बू भी खा लो.."
 आज़म ने झिल्लियाँ शक़ीना की तरफ बढ़ा दीं।
"कहाँ से लेकर आया रे तू ये सब?"सफ़क़त ने कड़कती आवाज़ में पूछा।
   "भंडारे से अब्बू!"
 "तू जानता है की तू मुसलमान है उन्होंने तुझसे पूछा नहीं की तू कौन है?तेरी टोपी और कुर्ते से भी नहीं पहचाना.बोल..!"
  "पहचान लिया था अब्बू!लेकिन उन्होंने इस बात पर गौर नहीं  किया कि मैं मुसलमान का बेटा हूँ..उन्होंने मुझे देखते ही मेरे हाँथ में सब्जी-पूड़ी की प्याली थमा दी।उन्होंने ये जान लिया था की मैं भूखा हूँ...।"
  सफ़क़त को समझ आ गया की वो गलत था।भूख मज़हब से बड़ी होती है।इंसान किसी भी धर्म में पाये जा सकते हैं।हिन्दू या मुसलमान नाम की हंथकड़िया इंसान के हांथो में पड़ी हुई हैं।
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                                 =सुशान्त मिश्र