Tuesday, 27 June 2017

चाँद! तुझे ईद मुबारक़

    पूरे एक महीने के रोज़ों के बाद शाम को सब ईद के चाँद का दीद करने इकट्ठे हुये थे।अभी-अभी मग़रिब की नमाज़ पढ़ी गयी।मौलाना साहब का अंदाज़ा है कि चाँद महज़ बीस मिनट के भीतर ही निकल आयेगा।सब ख़ुश थे।आसमान की ओर एक टक लगाये पूरा कस्बा छतों पर था। पंचायत टीले पर लगी भीड़ भी इसी दीद के इंतज़ार में थी। इस सबके बावजूद एक लालू ही था जो अपनी अन्धी अम्मा के साथ घर में क़ैद था। अम्मा बार बार कहती,"जा रे लालू! तू भी चाँद का दीदार कर ले। बड़े नसीब वालों को मिलता है उसका दीद, मुझ बुढ़िया को ही देख ले,अल्लाह ने जब तक चाहा जी भर दुनिया देखी ,चाँद देखा,ईद की दावतें उड़ाई,और अब जब आंखों से रौशनी ही रुख़सत हो गयी तो दुनिया का क्या!ख़ुद का भी दीद नहीं होता। तू जा न! अब भी बैठा है।"
  "अम्मा! क्यों इतना परेशान हो रही है? जब चाँद दिखेगा तो सारा क़स्बा ख़ुशी से झूम उठेगा,हमें भी मालूम चल जायेगा।जाना कोई ज़रूरी तो नहीं" लालू दलीलें देकर अपना काम करने लगता। अम्मा उठकर चारपाई पर लेंट गयीं।
   "हां.. हां.. ठीक है...अब न जा कोई बात नहीं! मेरे कहने से क्यों जायेगा? जाता तो तू ख़ूब था,चाँद का दीद भी करता था और चांद की रात हमेशा देर से लौटता भी था।अब न जाने क्या हुआ? लेकिन ये जान ले मेरे बच्चे! मैं तेरी अम्मा हूं,सब मालूम था मुझे!तब भी,और आज भी,सिर्फ़ आंखें नहीं रहीं तो क्या?अपने लाल का दर्द तो महसूस ही होता है न"
   लालू छलक उठा। मज़ाकिया अंदाज़ में ख़ुद को ख़ुद में कैद कर अम्मा को समझाने लगा,
    "अम्मा!!! ये तू क्या बफले जा रही है? तब दिन कुछ और थे,अब वो नहीं रहे। बच्चा था तब मैं अम्मा। अच्छा मुँह खोल दवाई पी ले।"
    सर में हाँथ लगाकर उठाया और चम्मच में घोली दवाई अम्मा को पिलाकर फिर से लिटा दिया।
  "चल अब सो जा अम्मा!कल ईद है मुझे बड़ी मेहनत करनी है। सारे मेहमान इकट्ठे होंगें,उनके इस्तक़बाल का इंतज़ाम भी तो करना है न।"
  "हां में सो जाऊंगी,पर तू एक बार चाँद..."
    अम्मा का दिल नहीं मान रहा था,पर लालू बीच में टोंकते हुये बोला,
   "क्या अम्मा! अब तुम सो जाओ,चाँद जल्द ही आने वाला है,पता चल जायेगा।"
   "जैसी तेरी मर्ज़ी...वैसे अब मेरी आँखें तू ही है न बेटा! सो कह दिया..नहीं जाना चाहता,तो मत जा.."
हमेशा से बन्द आंखों को अम्मा पलकों से ढकते हुये,चारपाई की पाटी पकड़ लेट गयी। लालू बर्तन समेटने लगा।कुछ सफाई करनी थी सो झाड़ू उठाया ही था कि साबिर आ धमका।बड़ी हड़बड़ाहट में घर के अंदर शरीक हुआ।
    "अबे लालू! कहाँ हो बे?"
"हां आता हूँ रे! ठहर ज़रा"
  हाँथ में झाड़ू लिये लालू सामने आया,
   "क्या हुआ? क्यों गला फाड़ रहा है? चाँद तेरी छत पे गिर पड़ा क्या जो इत्ता ख़ुश हुये जा रहा है"
  "अरे नहीं रे! फ़िज़ूल का बक़वास मत कर। चल मेरे साथ अभी"
  "पर कहाँ भाई"
  "अरे तू चल तो सही फिर बताऊंगा"
  "रहने दे,मुझे कहीं नहीं जाना यार! तू जा न,अम्मा भी बोल-बोल के थक गई,वैसे भी मुझे बहुत काम है,तू जा रे"
  "अरे काम फिर कर लियो,अभी चल तो सही तुझे दिखाना है कुछ"
  "बतायेगा भी कुछ कि सिर्फ भड़भड़ाता ही रहेगा,ऐसा क्या दिखायेगा तू मुझे?"
   "वो क्या है कि,उसे मैं अपने लफ़्ज़ों से बयाँ नही कर सकता,लेकिन इतना पक्का है मेरे जाँ नशीं!तू दीद कर उछल पड़ेगा"
   "अच्छा!!!! अगर फ़िज़ूल कुछ हुआ तो?"
   "अल्लाह क़सम! जान ले लेना मेरी जान! तू चल तो सही"
साबिर ने झाड़ू हाँथ से छीनकर आंगन में हीं फेंक दिया।हाँथ पकड़ कर साथ चल दिये दोनों।
    "हाँथ छोड़ मेरा! अब मैं बच्चा नहीं रहा रे"
   लालू ने साबिर का हाँथ झटकते हुये कहा। साबिर रिश्ते में लालू का चचाजान लगता था। बचपन में अक्सर लालू का हाँथ पकड़कर चलने की आदत थी साबिर की,सो आदत न गयी अब तक।उम्र में कोई खासा अंतर न था यही कोई दो बरस ही बड़ा होगा साबिर लालू से। दोनो की ख़ास बात ये थी कि दोनों ही माह-ए-रमज़ान के मुबारक़ वक़्त में दुनिया मे तशरीफ़ लाये थे।लालू चौथे रोज़े के दिन का था और साबिर पंद्रहवें रोज़े के दिन का। यारी-दोस्ती सारी कहावतें बौनी हैं इनके।ये रिश्तेदार कम यार ज़्यादा हैं।
  "अच्छा बेटे! अब ये तू मुझे बतायेगा? अरे मुझे तेरे अलावा भी कुछ याद है, तू जिस दिन पखाना अकेले जाना सीखा था,उस दिन से आजतक,सब जानता हूँ मैं,अबे! चचा हूँ तुम्हारा भूलो न"
   साबिर कभी-कभी मसखरी कर देता था,चचा होने के नाम पर। दोनो मुस्करा उठे। चौराहे से दायीं ओर मुड़ते ही लालू सहम गया।
   "अरे मेरे चचा! किधर जा रहे हो ज़नाब? जानते हैं न आप कि वो किसका मोहल्ला है? जीते जी ज़न्नत दिखाओगे आप,अल्लाह क़सम"
    साबिर मुस्कराया,"अरे जानता हूँ न मेरे बच्चे! इधर मेरे लालू का चाँद रहता है,जिसका दीदार उसके लिए ज़न्नत से भी बढ़कर है,और ईद मनाने के लिये चाँद का दीद ज़रूरी होता है न जाँ नशीं!फिर किस बात का डर? चाँद का दीद करना कोई गुनाह तो नहीं है न! कल पूरी दुनिया ईद मनायेगी तो क्या मेरा लालू नहीं मनायेगा?"
   अचानक लालू की आंखों में आँसूं आ गये। उसका कल उसकी पीठ से उधड़कर उसकी हथेलियों में आ गिरा।
  "सच कह रहे हो न चचा?"
  "नहीं तो! तुझे रुलाने से मुझे ख़ुशी मिलेगी न पगले! यकीन नहीं होता तो चल"
  "क्या सच में.....?"
  लालू की ख़ुशी आंखों में यूं छलकी की ज़ुबान और गले ने अपना दम तोड़ दिया।
  "हां रे! साफ़िया शहर से लौट आयी है। उसके घर पे वो अपना ज़ाकिर है न अरे वो ड्राइवर ज़ाकिर,उसी ने घर आते ही बताया..जैसे ही पता चला में दौड़कर तेरे पास आ गया..अब चल देर मत कर,वरना चाँद निकल आया तो तेरा चाँद ग़ुम हो जायेगा.. चल"
    लालू,साबिर के गले लिपट पड़ा।दोनों की आंखें नम थी। बचपन से अब तक के वो हसीन दिनों की खट्टी-मीठी यादें आंसुओं से बह रहीं थी। साफ़िया इन आंसुओं का वो क़तरा थी जिसे लालू कभी अपनी आंखों से बह नहीं पाया।बारवें दर्ज़े तक साथ में पढ़ते हुए दिन कब गुज़रे थे? पता ही नहीं चला। मग़र जबसे साफ़िया आगे की पढ़ाई के लिये शहर गयी है,हर पल बोझ सा जिया है लालू ने। लालू को बस उसकी आख़िरी कही बात याद रहती थी,
    "लालू में लौटकर जल्दी ही आऊँगी.. फिर हम दोनों साथ में लुका-छिपी खेलेंगें।"
  लालू अकेले ही इस बात को याद कर हंसता और जब ग़म बढ़ जाता रोने लगता। लालू ख़ुश न रहता तो साबिर को खुशी कैसे सुहाती? साबिर ने शादी की,बच्चे हुये..पर जो खुशी लालू को वो देना चाहता था,शायद आज वो उसे देने में कामयाब हो पायेगा।
  "ए नौटंकी! चल अब वरना सब गुड़ गोबर हो जायेगा यहीं"
साबिर ने संभलते हुये लालू के आँसूं पोंछे। लालू अब बहु कुछ सहम हुआ सा था।
   "साबिर! यार क्या नवाबों के मोहल्ले इतनी रात गये जाना ठीक रहेगा?
     "अमा यार लालू खामखाँ घबरा रहा है।इंसान ही हैं,चाट थोड़े ही जायेंगे,और फिर कह देंगे कि हमारी बस्ती से,आपकी बस्ती में चाँद का दीद जल्दी होता है,बस तू चल अब घबरा मत"
   "मग़र... यार..."
  "अब ये अगर-मग़र बाद में करना,चल पहले"
दोनों अब नवाबों के मोहल्ले में दाख़िल हो चुके थे। साफ़िया के मक़ान के आगे बने चबूतरे पर जमात लगी हुई थी।सब चाँद के इंतज़ार में बैठे अपने-अपने अंदाज़, राज़,अल्फ़ाज़ बयान किये जा रहे थे।बुज़ुर्गों की भीड़ से अलग जवान लोगों की टोलियां अपनी लफ़्फ़ाज़ी में मशरूफ़ थीं। साबिर ने ज़ाकिर ड्राइवर की कमीज का कोना खींचा। उसने मुड़कर देखा,भौचक देखता ही रह गया,हड़बड़ाहट में बोला,
   "अमा मियाँ साबिर तुम ?इस वक़्त? मरवाओगे क्या? घर में तसल्ली न हुई तुमसे।
  "अमा ज़ाकिर भाईजान! न जाने कितनी ईद तसल्ली करते-करते  गुज़र गयीं इस मखदूम लालू की,और अब इसकी तसल्ली इसके सामने है,तो इसकी तसल्ली को भी तस्सली मिल जायेगी।तुम बस हमारे खड़े होने का इंतज़ाम ऐसी जगह करो कि इस मुफ़लिस को अपने चाँद का दीदार हो जाये,दुआ मिलेगी।"
   "अमा मियाँ सठिया गये हो तुम! मालिक को पता चल गया तो ख़ाल खिंचवा देंगे हमारी और नौकरी जायेगी सो मुनाफे में...न हमसे न होगा.."
  "अबे मान भी जा ज़ाकिर! अल्लाह कसम तुझ पर उठने वाली आंखे निकाल लूंगा,बस एक बार मान जा यार.."
ज़ाकिर नज़रे झुकाये "न-न"किये जा रहा था। लाख कोशिशों के बाद भी तैयार न हुआ।
  "चल ठीक है! तू मत बता..हमें जहाँ से इसका चाँद नज़र आयेगा वहीं जम जायेंगे.. जान थोड़े ही ले लेगा कोई..चल रे लालू"
   साबिर को तैस आ गया। लालू के हाँथ खींचकर उसे आगे की ओर चलने के लिए धकेेल दिया। ज़ाकिर ने लालू के हाँथ पकड़ लिया,"सुन! तेरी मोहब्बत अपनी जगह है और ज़िन्दगी अपनी जगह,सोंच ले"
    "ज़ाकिर भाई, अगर कुछ सोंचना ही होता तो दिमाग चलता न,लेकिन दिमाग ने आज दिल से हार मान ली है और दिल साल रोज़ा रख के बैठा है,जब तक चाँद नहीं दिखाई देता रगों को खून की इफ्तारी न मिलेगी।"
  लालू फिर सेे छलक पड़ा।
  "अच्छा-अच्छा ठीक है,जाओ! उधर नीम के चबूतरे के पास खड़े हो जाओ,साफ़िया मेडम सबसे ऊपर वाली बालकनी में खड़ी होंगी"
ज़ाकिर पिघल गया।दोनों बढ़े ही थे कि उसने फिर रोका,
  "और सुनो!कोई पूछे तो कहना ज़ाकिर के साथ आये हैं"
   "शुक्रिया ज़ाकिर भाई"
  साबिर के कंधे पर हाँथ रखे लालू चल तो रहा था मगर उसकी आँखें अपने चाँद को ढूंढ रही थीं।दोनों चबूतरे के पास पहुंचे।ये लफ़्फ़ाज़ों की जमात थी।अचानक पता नहीं क्या हुआ कि,लफ़्फ़ाज़ों में हलचल मच गई।इस भीड़ की हिस्से में दो दोस्त ख़ुद को छिपाने में मशरूफ़ थे।इसी बीच कुछ बातें होने लगीं।
     "अबे जानता है,नवाब साहब की बहन शहर से लौट आयी है,सुना है बहुत पढ़ी-लिखीं हैं"
  "अबे ज़ाहिल!पढ़ने ही तो गयीं थी वो शहर को,लेकिन एक बात और जानते हो शहर में रह के भी नये ज़माने के रंग नहीं चढ़े उनपे। सुना है,आज भी ख़ानदानी सलवार सूट ही पहनती है"
  "अमा ये सब छोड़ों मियाँ,सबसे बड़ी बात ये है कि वो जितनी प्यारी लगती थी अब उससे भी सौ गुना क्या हज़ार गुना और खूबसूरत हो गयी हैं,सच ही है। ऊपर वाले के रहम-ओ-करम का नतीज़ा है ये सब,जिसे परोसता है दोनों हाँथों से परोस देता है।"
   मग़रिब की अज़ान के बाद से लगभग बीस मिनट होने को हैं,मग़र चाँद अभी तक नहीं दिखा,लोगों में बेचैनी बढ़ गयी।सबकी नज़रें आसमान में टिकी थी। इस दुनिया से दूर लालू की आंखें नवाब साहब की ऊपर वाली बालकनी को ताकते हुये अपने चाँद का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहीं थीं।पीली-गुलाबी बत्तियों से रौशन वो बालकनी लालू को रंगीन सितारों से सज़ा आसमान नज़र आया,बस कमी थी तो चाँद की।
     "वो देखो चाँद निकल आया,मुबारक़ हो"
  साफ़िया के बालकनी पर आते ही लालू ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाया। सबकी नजरें उसकी तरफ मुड़ गयीं।साबिर सहम गया। ऐसे मुबारक़ मौक़े पर भला ऐसा भद्दा मज़ाक कौन बर्दाश्त करेगा? उसने लालू को डांटते हुये वक़्त की नज़ाकत अपने हिस्से की,"अबे सठिया गया है! चाँद निकलता तो सबको दिखता न! बड़े आये..मुंह बंद रख अपना..दो चमाट देंगे नहीं तो..."
   बालकनी पर खड़ी साफ़िया ने आसमान की तरफ उंगली उठाई। उसके इशारे के साथ सबकी नजरों ने हमकदमी की और यक़ीनन चाँद निकल चुका था। बस,खुशियों का सिलसिला शुरू हुआ,लोग आपस में गले मिलने लगे।नवाब साहब ने सबको रुकने के लिये पहले ही कहलवा दिया था,और उन्होंने शहर से लाये हुये खजूर भीड़ में बंटवाने शुरू कर दिये।
  इधर लालू इस सोंच में था कि "साफ़िया तो उजाले में थी सो दिख गयी पर उसे ये कैसे पता चले कि मैं भी यहां हूँ?"
    साबिर ने उसके चेहरे की तरफ़ देखा।उसके कुछ कहने से पहले ही बोल पड़ा,"क्या सोंच रहा है? अबे ये सोंचने का वक़्त नहीं है,कुछ करते हैं ताकि तेरा पैग़ाम उस तक पहुंच जाये"
    "मग़र वो कैसे चचाजान?"
  "अरे तू देखते जा मेरे बच्चे!जैसा मैं बोलता हूं करते जा"
  लालू ने मंजूरी से सिर हिलाया। साबिर ने उसे ज़ोर का धक्का मारा अब वे दोनों बाहर लगी पीले बल्ब की बत्ती के उजाले में थे।दोनों आपस में एक-दूसरे पर चिल्लाने लगे।
   "अबे मैं कह रहा हूँ न तो मानता क्यों नहीं? ऐसा नहीं हैं"
  "अबे तुझे मालूम भी है कुछ! ऐसा ही है पक्का.."
बहस बढ़ती गयी। देखते-देखते बात मार-पीट तक उतर आई।सारी भीड़ इकट्ठी हो गयी।ज़ाकिर मियाँ को भी ख़ुद का हश्र सोंच कर पसीने आ रहे थे।"नहीं है,है" ही सुनाई दे रहा था बस। किसी बुज़ुर्ग ने टोंकते हुये कहा,
"आख़िर बात क्या है?क्यों इस मुबारक़ मौके पर इस क़दर लड़ रहे हो?"
   एक दूसरे का गलेबान छोड़ कर दोनों दूर हो गये।साबिर बोला,
  "अरे चाचा! इस पगलेट से मैंने पूछा कि चाँद देर से क्यों निकला? तो जानते हैं क्या बोला? कहता है चाँद भी किसी चाँद के दीदार के इंतज़ार में था। बेअक्ल,बैलबुद्धि..."
  सब खिलखिलाकर हंस पड़े।बालकनी पर खड़ी साफ़िया मुस्करा रही थी। दोनों यारों की मेहनत बेकार न गयी।लालू से पूछा गया,
   "तो इसमें लड़ने की क्या बात थी?"
  लालू बोला,
   "यही तो..! ये ज़नाब कहते हैं चाँद भला किसका दीदार करेगा? वो तो ख़ुद चाँद है,मैं इन्हें यही समझा रहा था कि इश्क़ चाँद को भी किसी दूसरे चाँद से दिल लगाने को मजबूर कर देता है,भले ही चाँद ने सिर्फ़ किसी तारे से ही इश्क़ कर लिया हो मग़र उस चाँद के लिये उसका महबूब उससे भी बढ़कर है।"
    जवानों ने खूब हो हल्ला मचाया मग़र कुछ बूढ़े खीझ गये। उनमें कुछ बूढ़े थे,जो कभी जवान रहे थे उन्हें भी ये बात अच्छी लगी।उन्होंने बात को कुछ यूं रफ़ा-दफ़ा किया,
   "चल ठीक है मजनू की औलाद! अब घर जाओ अपने,इश्क़ न सिखाओ हमें,इश्क़ हमारे भी लहू में था,आज भी है,चलो जाओ रे!"
   दोनों घर की ओर चल दिये। लालू के क़दम ही न बढ़ रहे थे। उसके लौटने से पहले ही साफ़िया बालकनी से जा चुकी थी,और ये उसे नाग़वार गुजरा। दोनों टहलते हुये चौराहे तक आ गये। खामोशी कस्बे को आगोश में समेटे थी।लालू बोल पड़ा,
  "अमा साबिर!"
   "हां बोल!"
    "कितना अच्छा होता जो साफ़िया साथ होती?"
   "हां बिल्कुल...ख़्वाब अच्छा है!"
  "नहीं में हक़ीक़त की बात कर रहा हूँ कि, काश! हम आपस में ढेर सारी बातें कर पाते। काश! उससे शहर में बिताए गये दिनों के किस्से सुनता और उसके न होने पर गांव में बिताये गये ख़ुद के बुरे दिनों की दास्तान सुना पाता उसे..काश!"
  इंसान की ख्वाहिशें कभी नहीं मरतीं। जितना हासिल हो जाता है और भूख बढ़ जाती है।लालू ने लंबी सांस लेते हुये अफ़सोस का"काश" ज़िगर के किसी कोने में बिठा लिया।
   "बस कर भाई! तू ये काश-काश के चक्कर में मुझे सांस नहीं लेने दे रहा।"
  साबिर थका महसूस करने लगा। चौराहे के ठीक बीच में बैठ गए दोनों। चाँद आसमान चढ़ता जा रहा था और लालू ख्वाब बुनते जा रहा था।अचानक दो परछाइयां इन्हें अपनी ओर बढ़ती दिखाई दी।
     "चाँद का दीद मुबारक़ हो"
  लगभग दस ग़ज़ दूर से आयी आवाज़ के साथ दोनों परछाइयां इन दोनों के करीब आ रही थीं। साबिर काँपती आवाज़ में जवाब देते हुये उठ खड़ा हुआ,
   "आपको भी! मगर माफ करियेगा,हमने आपको पहचाना नहीं"
   "कैसे पहचानेंगें चचाजान? अरसा बीत गया आवाज़ सुने हुये"
  साफ़िया,ज़ाकिर की बेग़म के साथ चौराहे तक लालू से मिलने आ पहुंची थी।साबिर और लालू को तो यक़ीन ही नहीं हो रहा था। लालू ने ऊपर वाले का शुक्र अदा किया,
   "या मेरे मौला! तू सबकी फरियाद सुनता था ये तो मैं जानता था मग़र इतनी जल्दी मेरी दुआ क़ुबूल होगी मैंने ख़्वाब में भी न सोंचा था।"
    "अबे धोखे की तरह खड़ा ही रहेगा,अपने ख्वाब का बढ़कर इस्तक़बाल भी करेगा"
  साबिर ने लालू को आगे बढ़ने के लिये कहा और ख़ुद चौकसी पर खड़ा हो गया।
    साफ़िया और लालू उस चाँद की हल्की रौशनी में एक दूसरे को ताक रहे थे। आंखों से इंतज़ार झरकर सीने तक आ पहुंचा। दो आवाज़े आयीं...
   " सफ्फू....मेरी सफ्फू..तू आ गयी..चल दोनों लुका-छिपी खेलते हैं"
    "हाँ मेरे लल्लू...बहुत दिन हुये एक-दूसरे में ग़ुम हुए"
    
     दो चाँद गले मिल गये, जो अब तक अधूरे थे पूरे हो गये। दो वक़्त एक जगह आकर ठहर गये। दो गुज़रे हुये कलों ने आज के सामने घुटने टेक दिये। दो चाँद अब ईद मना रहे हैं ये कहते हुये....
   "मेरे चाँद, मुझे तेरा दीद मुबारक़,दुनिया तुझे तेरी ईद मुबारक़"
      
   

Wednesday, 18 January 2017

"हम" और "मैं"

हम और मैं
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जब दुनिया रची जा रही थी
सब कुछ पूर्व से ही सुनिश्चित था शायद

नाली के कीड़े से लेकर
बड़े-बड़े जंगली हांथियों तक
ज़हरीले साँप बिच्छुओं से लेकर
प्रकृति के दोस्त केंचुए तक
सारे पशु-पक्षी और हम...

हम मतलब दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रजाति
हम मतलब ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना
हम मतलब सद्गुणों से भरे-पूरे जीव
हम जो,
पूरी दुनिया के जीवों की अच्छाई सीख गये
हम जो,
देवताओं को भी सम्मोहित कर लेते थे

हम जो,
न्यूटन के क्रिया-प्रतिक्रिया नियम की तरह
प्रकृति को प्यार देते थे
प्रकृति हमारी जरूरते पूरी किया करती थी
जैसे अब भी करती है...

हम कुछ इस तरह विकासशील होने लगे
हमने सीखीं
अच्छाइयों के साथ मतलबी बुराइयों की हर चाल
जिसने उखाड़ कर फेंक दी
हमारी बरसों से संजोयी हुई प्यार की पौध
हमने खेला वो खेल,
जहाँ "हम" नहीं "मैं" विजयी होता है

हम सब "हम" के दौर से भागते-दौड़ते
आकर खड़े हो गए अकेले "मैं" पर

                            #सुशान्त_मिश्र

Tuesday, 10 January 2017

अपमान-राजनीति की एक अजब चाल

आंदोलन जारी था।पूरे शहर में जाम का माहौल..चिलचिलाती धूप में कुछ लोग चिल्लाये जा रहे थे..,"उसकी जुबान काट दो...उसे जेल में डाल दो..उसने अपमान किया है..हाँ...हाँ..उसे सजा मिलनी चाहिये।"
एक महान नेता की मूर्ति के आगे ये सब हो रहा था।मुझे लगा  मूर्ति अभी रो देगी।वो मूर्ति ..और उसकी रूह...तड़प रही होगी शायद...।धूप बढ़ती जा रही थी।लोग बेहाल थे।गाड़ियों की सीटियां और लोगों की बेचैनी उन आंदोलनकारियों को न सुनाई दे रही थी न दिखायी दे रही थी।
मैं भी ऑटो में बैठा ये सारा तमाशा देखे जा रहा था।रिक्शा चालक से मैंने यू ही पूछ दिया,"ये सब क्या है भैया?और कितनी देर हमे इंतज़ार करना पड़ेगा?ये जाम तो कम होने का नाम ही नहीं ले रही।"
"अमा! क्या टेंशन ले रहे हो यार?..तुम्हे घर जाने की पड़ी है...ज़रा उन लोगों को भी देखो जो अपने घरों को छोड़कर यहाँ कब्बड्डी खेल रहे हैं।इनका खुद का घर कैसा भी हो?लेकिन बड़े भक्त हैं ये सब..किसी का अपमान नहीं सह सकते।किसी ने इनके पार्टी मुखिया को थोक के भाव गालियां भांज डाली...अब ये लोग उसका बदला ले रहे हैं।"
  "अच्छा!फिर तो सही कर रहे हैं ये लोग...कोई हमारे मुखिया को गाली देगा तो हम भला कैसे बर्दाश्त करेंगे?लेकिन इन लोगों को उसके लिये व्यक्तिगत कार्यवाही करनी चाहिए न...भोली-भाली जनता..."
मेरी बात पूरी भी न हुई की वो बोल उठे,"अमा फिर वही बात!..कौन भोली-भाली जनता?ये जो लोग सड़कों पर है न वो भी जनता है और ये जो हम जैसे कुछ लोग जूझे जा रहे हैं ये भी जनता है।देखो भाई!..कुछ लोगों को अपने मतलब के अलावा कुछ नज़र नही आता।अभी ये लोग ग़दर काटेंगे..कुछ दिन बाद चुनाव है..जनता इन पर दया दिखायेगी..और ये फिर आ जाएंगे सत्ता में..जनता को फिर मिलेगा घण्टा..."
 
बड़े भैया बहुत गुस्सा हो गए थे।वो गरियाते रहे हम सुनते रहे।कुछ गाड़ियां आगे बढ़ी और हमारा ऑटो अब ठीक मंच के सामने था।दो नौजवान लड़के,जोकि अपने पुराने कपड़ों के ऊपर अपनी पार्टी का चुनाव निशान चस्पा कर,मंच पर दायीं और बायीं ओर खड़े थे।नारों का दौर जारी था।भाषण शुरू हुआ।बीच-बीच में बहुत जोरों से तालियां बजती थी।मामला नारी अपमान का था।मुद्दा बड़ा था।आंदोलन भी अच्छा था।                   भाषण के बीच वक्ता ने अपील की,"वो हमारे लिये देवी हैं।हम उनका बहुत सम्मान करते हैं।उनके लिए कोई अभद्र भाषा का          प्रयोग करे हम हरगिज़ बर्दाश्त नही करेंगे।उसने हमारी बहन का अपमान किया है।हम बदला लेकर रहेंगे।"
   अब मैं समझ पाया की माजरा क्या है?सही भी है हम जिसे भगवान मानते हैं और कोई हमारे भगवान का अपमान कर दे तो गुस्सा तो ज़ायज़ है।
   भीड़ में से एक आंदोलनकारी हमारे ऑटो की तरफ निकलकर आया।मोबाइल फ़ोन की घंटी बजी।फ़ोन उठाते ही बोला,"का है री!अब बेर बेर काहे फून करती हइ आंय! भोरे बोल के आये रहा की बिल्ल्वइहे न!लेकिन ई ससुरी! मेहरुआ के जातअइसेन होति हइ|"
शायद फ़ोन उन साहब के घर से था।उधर से कोई महिला की आवाज आ रही थी।आवाज़ सुनाई न पड़ी तो उन्होंने उसका स्पीकर ऑन किया।
वो बोले,"अब का है कुछ बतइहौ!की ख़ाली मौज़ियाय बदइ फ़ून किहे हउ??"
  "मौज़ियाय बदे न किहेन!गोरून बदे चारा न आवा...तुमहू गएउ...बड़कन्नेउ गये...अब चारा फटता को करइ?? हमार बस का जो रहइ कइ डारेन..."उधर से जवाब आया।
   "अरी! गौरिया कहाँ है? हम उ से चारा काटै कहे रहन...कहाँ मरि गइ??"
  "गौरिया कहति हइ की न जाइब...हमारि बेइज़्ज़ती होत हइ...गाँव म बियाह तै कई दिहे हउ..अब उहे से चारा कटवाई त लोग का कहिहे...अउ उ मनोजवा! उ तो वइसे भी बड़ा दिक्कात रहा..और फिर धमकियो तक दिहिस रहा कि हार-पात के काम करइहउ त हम गौरी से बियाह न करिबि...तुमका तउ इज़्ज़त मान के होश कहाँ हइ?"
   "चुप ससुरी!बड़ा इज़्ज़त मान के पाठ पढ़ावै चली हइ...हमारे नेता को कोई गरिया दिहिस त हम सब छोड़-छाड़ के आ गएन! उनकी इज़्ज़त,हमार इज़्ज़त। लोग गाँव म वैसेउ कहाँ जिए देहे..हमार देवी जैसेन नेता का कोई गरिया दिहिस औ हम घर घुसे रही...कुछो कर..गौरिया न जात त खुद जा...हम जब तक इन्साफ न मिल जाई आइब न!! और हाँ बड़कन्ने की मेहरुआ से बता दिहेउ वहउ हमरे संघे हइ...."
       फोन जेब में रखा।आगे की ओर चिल्लाते हुये बढ़े...
अब नेता जी पूरे जोश में थे,"जो हमारे नेता की तरफ आँख उठाएगा हम बर्दाश्त नहीं करेंगे...अब फैसला जनता करेगी..आने वाले चुनाव में हम सब इसका बदला लेकर रहेंगे.. क्यों भाइयों!!!!!!"उसने कहते हुए जनता की तरफ़ हाँथ फैलाए।सब एक स्वर में "ज़िन्दाबाद-ज़िन्दाबाद"के नारे लगाने लगे।अब ऑटो थोड़ा सा और बढ़ा ही था कि एक ज़ोरदार अपील सुनाई दी,...,"जो हमारी बहू बेटियों बहनों का अपमान करेगा क्या हम उसकी बहू बेटियों बहनों का सम्मान करेंगे??"
सारे माहौल में "नहीं....."एक साथ गूंज उठा।फैसला हो गया था।ऑटो वाले भैया भी खीजे एक्सीलेटर खींचे जा रहे थे और बोले,"वाह री राजनीति के ठेकेदार"...
  

अपवादित इंसान

उसका इंसान होना अपवाद सिद्ध होता है
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जब उसके सूनेपन को
कोई समझ बैठता है उसका सर्वश्रेष्ठ गुण
जब उसका मौन
कोई समझ बैठता है सर्वश्रेष्ठ संगीत
जब उसका मुस्कुराना
कोई समझ बैठता है सर्वश्रेष्ठ कोमल अभिव्यक्ति
तब शुरुआत होती है एक युद्ध की
युद्ध का उद्देश्य होता है उसे मोह से हरा देना

जब वह जा रहा था अपनी अबूझी मंज़िल की ओर
उसे लग गई अचानक एक ठेस
जिसने घायल कर दिया उसका पूरा वर्तमान
वो रोड़ा,
जो बन सकता था उसकी हार का कारण
वह उसे ठेस देने के तुरंत बाद बढ़ चला
अपनी नयी राह पर एक नयी मंज़िल की ओर
उसने रोड़े को दिखा दिया उसका भविष्य
अब,
दोनों बढ़ चले थे अलग-अलग रास्तों पर
अपने भविष्य की ओर

वह तब भी खुश था
जब अनंतकाल से संजोयी हुई उसकी खुशियां
कोई लूट ले गया था
वह तब भी खुश था
जब उसके स्वयं के बनाये हुये रिश्ते उसे धकेल रहे थे
संघर्ष की आग में

न ही वह मनाता है विजय का उत्सव
न ही किसी पराजय का शोक
उसे काल की गति से नहीं है भय
भय नहीं क्योंकि मोह नहीं
मोह नहीं तो इंसान कैसे?

मोह हार चुका था
अब वह अपनी पराजय का शोक नहीं
शत्रु की विजय का उत्सव मना रहा था

सच,
उसका इंसान होना अपवाद सिद्ध होता है
उसके स्वभाव से
                                    #सुशान्त_मिश्र

Wednesday, 7 December 2016

वो सही थे...

वो सही थे......
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आज की तरह कल भी नींव खोदी जाएँगी
और फिर
मिट्टी, ईंटों और मसालों से बनायीं जाएँगी कुछ दीवारें
दीवारों से बनाये जायेंगे मकान...बस मकान..

मकान के अंदर होंगी,
हड्डियों,खून और माँस के लोथड़ों से बनी कुछ चलती-फिरती लाशें
आँखे खुली होंगी उनकी
फिर भी नहीं देख पाएंगे एक-दूसरे को
वो व्यस्त होंगे
मकान के एक-एक कोने पर अपना आधिपत्य करने में
उस कोने में बनाएंगे वे कल्पना की एक नयी दुनिया

वे खाएंगे कल्पनाओं को
ओढ़ेंगे उससे बनी चादरें
वो करेंगे कुछ कर्म स्वयं के लिये
जिससे वो खुश रह सकें
वे होंगे स्वयं के देवता
मनुष्य जो दूसरों के लिए जी रहा है,
जियेगा तब भी,किन्तु स्वयं के लिये

वो अपने वर्तमान में लिख गये आज का भविष्य
हमने उन्हें सत्य सिद्ध किया...
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                           #सुशान्त_मिश्र

Monday, 8 August 2016

आइना और वो...

वो अंधकार से लड़  रहा है
वो हर बात को समझ रहा है..जान रहा है
उसके लिए कुछ... कुछ भी असंभव नही

पेड़ की टहनियों का उनसे अलग होना
एक तने का रोना
पके फल का टूटकर गिरना और फिर उसका हश्र
फिरसे बने बीजों से नए पौधे तैयार होना
ये सब देखकर,
टूटकर जुड़ना नहीं,
टूटकर नया बनना सीख रहा है वो,
पेड़ों से...उनके तनों से
उनके फलों से भी..

अकेले में कभी-कभी छटपटाता है
बौखलाकर खुद को आईने में देखता है
और जोर-जोर से रोता है
और फिर अचानक...
आईना तोड़ देता है...
जानते हो आईना क्यों टूटा?
क्योंकि उसका धैर्य,उसका साहस छूटा
हाँ इसीलिये...इसीलिये वो आईना टूटा....
                                  सुशान्त मिश्र

Saturday, 6 August 2016

अपराजित प्रेम

~~~~~~~~~अपराजित प्रेम~~~~~~~~~~

सुनो;
मैं आज तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ
बुरा मत मानना,
क्योंकि मैं ऐसा कुछ भी नहीं कहूँगा,
जो तुम्हारे लिये हितकर न हो
तुम और मैं
समाज के मूल से निकली दो शाखायें
जिन्होंने आपस में एक दूसरे को गूंथ दिया
बिना किसी का भय किये
तुम,मुझे सिखाती थी, मैं कुछ यूँ ही सीख लिया करता था
तुम्हारी कभी न मिटने वाली अठखेलियों की रेखाओं से,

कल भी सब अच्छा था,आज भी सब अच्छा है
लेकिन आने वाला कल...
हमारे होंठ ठहर जाते हैं
सारे ज्ञान के घरों के किवाड़ धड़ाक से बंद हो जाते हैं
मन छटपटा उठता है जब तुम पूछ बैठती हो,
"आगे का क्या सोंचा है तुमने?"
फिर मैं एक लंबी सांस खींचकर
इधर-उधर देखने के बाद,
बड़ी लापरवाही से मुसकरा पड़ता हूँ
और तुम मेरे मूक हो जाने पर
अपने सवाल का जवाब खुद बताने लगती हो,
और वो भी मेरे नहीं पूछे जाने पर भी
तुम्हारा जवाब,तुम्हारे सारे सपनों के चित्र आसमान में खींचकर
मेरे मन को झकझोरकर,फिर मुझसे सवाल करता,
"क्या तुम वैसे बन पाओगे जैसा ये चाहती है?"

आज मैं तुम्हारे सारे सवालों का जवाब देने आया हूँ
मैं निष्ठुर सही,धोकेबाज सही,
पर तुम्हे यह सुनना पड़ेगा
सिर्फ सुनना ही नहीं समझना भी जो मैं समझाना चाहता हूँ,
हमने कई बार ज़िन्दगी की उलझी हुई अनेक गुत्थियों को,
सुलझा लिया है एक दूसरे के सहयोग से,
आज फिर तुम मेरा सहयोग करोगी न

तो सुनो,
मैं आज तुम्हारे सारे अधिकार तुम्हे सौंपना चाहता हूँ
मुझे भी तुम मुक्त कर दो अपने वचनों से
मैं भी कोशिश करूँगा की तुम मुझे भूलकर,
जियो अपनी नई ज़िन्दगी अपने सपनों के साथ
बस एक सपने का गला घोंट देना
मैं नहीं बन सकता तुम्हारे सपनों का राजा
क्योंकि मैं असमर्थ हूँ समाज के उस पेड़ के आगे
जिसकी छाँव में हमारा प्रेम पला,जवान हुआ
मैं झूठ इसलिये नहीं कह सकता क्योंकि
मैं झूठ सह नहीं सकता
तुम मेरा पहला प्रेम नहीं
तुम मेरी अंतिम चाह नहीं
तुम मेरी अधूरी प्यास नहीं
तुम मेरी कोई आस नहीं
तुम तो मेरी प्रेरणा हो,
मेरे कर्त्तव्य पथ बढ़ने की प्रेरणा जिसके लिए तुम हमेशा
मुझे दिखाती रहतीं थी मेरी औक़ात
और मैंने नहीं पार की तुम्हें दूषित करने की हदें

मैं तुम्हारे दिए सपनों को पूरा करने जा रहा हूँ
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए
लेकिन सच मानों,मुझे तुम्हे छोड़कर जाना पड़ेगा
तुम्हारे सुंदर भविष्य के लिये
ताकि आने वाले सुनहरे कल में
कोई मेरा नाम लेकर घोल न सके तुम्हारी ज़िन्दगी में विष
और तुम हमेशा खुश रहो....

अरे! ये क्या?तुम दुःखी हो गयीं
निराश मत हो हम फिर मिलेंगे जरूर
ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर
तब तुम अपने पूर्ण सपने के साथ मुझे मिलना
अचानक मुझे देखकर आंसू मत बहाना
बस मेरी बातों को याद करना
फिर मुझसे अजनबी होकर कहना
"बहुत अच्छा लगा आपसे मिलकर"

तब मैं समूचे समाज को दिखा दूंगा
एक नये प्रेम की परिभाषा का चित्र
फिर हम हारकर भी जीत जायेंगे
तब अमर होकर आसमान में एक तारे की तरह चमक उठेगा
हमारा हारकर,जीता हुआ अपराजित प्रेम......
                                       ~:  सुशान्त मिश्र